Success Story: सरकारी अध्यापिका संगीता ने जलाई शिक्षा की अलख, वीरान सरकारी स्कूल की बदल दी तस्वीर

Success Story: संगीता मौर्या उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में प्राथमिका विद्यालय में सरकारी अध्यापिका हैं। 12 साल पहले जब उन्हें सरकारी स्कूल में पोस्टिंग मिली थी, तब मुश्किल से 30-35 बच्चे स्कूल आते थे। इसके बाद संगीता ने शिक्षा की ऐसी अलख जगाई कि छात्रों की उपस्थिति 100 से ऊपर हो गई।

Jitendra Singh
अपडेटेड20 Apr 2026, 06:10 AM IST
Success Story: बच्चों के साथ संगीता मौर्या
Success Story: बच्चों के साथ संगीता मौर्या

Success Story: सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की दशा कैसी है, यह किसी से छिपी नहीं है। हमेशा छात्रों की उपस्थिति न के बराबर रहती है। वहीं प्राइवेट स्कूलों में छात्रों की भीड़ लगी रहती है। इसबीच उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले में एक सरकारी अध्यापिका ने शिक्षा की ऐसी अलख जगाई कि आज पूरे प्रदेश में चर्चा हो रही है। 12 साल पहले संगीता मौर्या को रायबरेली एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पहली पोस्टिंग मिली। इसके बाद स्कूल की जर्जर इमारत देखकर संगीता रोने लगी।

द बेटर इंडिया (The Better India) में छपी खबर के मुताबिक, संगीता ने बताया कि जब स्कूल गईं थीं तो 130 में से सिर्फ 30 छाक्ष स्कूल में थे। छात्रों की अनुपस्थिति देखकर वो हैरान रह गईं। स्कूल बेंच टूटी हुईं थी। स्कूल में सन्नाटा पसरा था। इसके बाद उन्होंने सोचा कि अब शिक्षा की असली यात्रा यहीं से शुरू होगी। संगीता बताती हैं कि अगर आज से 12 साल पहले मैंने शिक्षा की नई अलख नहीं जगाई होती तो मुझे पढ़ाने का असली मतलब नहीं समझ में आ पाता।

संगीता कभी मां बनीं तो कभी अध्यापिका बनकर शुरू किया काम

संगीता रायबरेली के डी ब्लॉक स्थित एक उच्च प्राथमिक विद्यालय में संस्कृत, अंग्रेज़ी और हिंदी पढ़ाती हैं। स्कूल में सिर्फ 3 अध्यापक हैं। हर एक अध्यापक को सभी विषय पढ़ाना होता है। अध्यापक उस विषय के एक्सपर्ट हों या न हो, उन्हें हर विषय पढ़ाना होता है। द बेटर इंडिया (The Better India) से बातचीत करते हुए संगीता ने कहा कि ग्रामीण स्कूलों में, आप सिर्फ़ एक विषय के शिक्षक नहीं होते। आप एक परामर्शदाता, एक मित्र, कभी-कभी एक नर्स या एक माँ जैसी भूमिकाएं निभानी होती है।

यह भी पढ़ें | कैंसर से जंग के बीच आरव ने CBSE में रचा इतिहास, 10वीं में किया टॉप

बच्चों को पढ़ाने के लिए घर-घर खटखटाए दरवाजे

संगीता बताती हैं कि शुरुआती दिनों में स्कूल बच्चे बहुत कम रहते थे। ऐसे में दोपहर में छुट्टी के बाद गांव के सभी घरों में जाती थीं। अभिभावकों को शिक्षा के बारे में जागरूक करती थीं और उन्हें अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेजने की सलाह देतीं थीं। बहुत से बच्चे थे, जो छोटा-मोटा काम करते थे। उससे जो पैसे आते नशे में खर्च कर देते थे। संगीता बताती हैं कि इस दौर में बच्चों और अभिभावकों को मनाना बहुत मुश्किल रहता था। मैं हमेशा अभिभावकों से विनती करती कि अपने बच्चों को स्कूल जरूर भेजें।

यह भी पढ़ें | UP के किसान ने बंजर जमीन को बना दिया सोना

एक महीने में बच्चों की उपस्थिति 100 हो गई

संगीता ने बताया कि धीरे-धीरे मेहनत रंग लाने लगी। एक महीने के भीतर छात्रों की उपस्थिति 100 के ऊपर हो गई। यह कोई आसान काम नहीं था। बहुत से बच्चों को बाल मजदूरी से खींचकर स्कूल लेकर आई। अभिभावकों को भी लगने लगा कि उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजकर सही काम किया। संगीता ने बताया कि जब बच्चे स्कूल आने लगे तो वो सिर्फ लेक्चर नहीं सुनना चाहते थे। मैं उन्हें कहानियाँ सुनाती, गाने गाती। कभी-कभी बच्चों के साथ खेलने लगती, जिससे बच्चों के चेहरे खिल उठते थे।

शिक्षा को बनाया रोचक

संगीता आगे बताती हैं कि बच्चों के भीतर शिक्षा की अलख जगाने के लिए नए पहलुओं पर विचार करना शुरू किया। उन्हें लोक कथाएं, पहेलियां और इंटरैक्टिव गतिविधियों का इस्तेमाल करना शुरू किया। समय के साथ, बच्चे उत्सुकता से भाग लेने लगे। उन्होंने शिक्षक, डॉक्टर और पुलिस अधिकारी की भूमिकाएं भी निभाईं। वह बताती हैं कि कक्षा में सभी बच्चे उत्साह के साथ हर चीज सीखते। उन्हें पता ही नहीं चल पाता था कि वो कुछ सीख रहे हैं। आज जब कोई बच्चा कहता है कि मैं संगीता की तरह शिक्षक बनना चाहता हूं, तो संगीता कहती हैं कि उन्हें गर्व महसूस होता है।

यह भी पढ़ें | क्लास में बच्चे चबाते थे तंबाकू, फिर IAS अफसर ने बदल दी तकदीर

प्रोफेशनल लाइफ और पर्सनल लाइफ को किया बैलेंस

संगीता बताती हैं कि स्कूल के बाहर वो एक पत्नी और मां हैं। उनकी शादी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुई। उनका मायका रायबरेली है। उनके सात साल का बेटा है। संगीता बताती हैं कि स्कूल की पढा़ई के दौरान अपनी पर्सनल लाइफ और प्रोफेशनल लाइफ को बैलेंस करके रखा। हालांकि एक छोटे बच्चे को संभालना काफी मुश्किल रहता है, लेकिन फिर भी वो पढ़ाई को ध्यान में रखते हुए ये सब बैलेंस रखती हैं। उन्होंने बताया कि वो अपनी कठिनाइयों को कभी छात्रों के सामने जाहिर नहीं होने दिया।

संगीता बच्चों के साथ बैठकर करती हैं लंच

संगीता ने बताया कि बच्चों के साथ पालथी मारकर बैठती हैं। उन्हीं के साथ बैठकर वो लंच करती हैं। इस दौरान बच्चों को लगता है कि मैं भी उनके जैसे ही हूं। मौसमी बुखार होने पर स्टाफ रूम में वो दवाएं भी रखती हैं। स्कूल 2 बजे बंद हो जाता है, लेकिन संगता का काम शाम तक चलता रहता है। छुट्टी के बाद पेपर वर्क, अगले दिन पढ़ाई की तैयारी जैसे तमाम काम रहते हैं। जिन परिवारों से बच्चे स्कूल नहीं आए, उनके घर जाकर बच्चों को स्कूल भेजने के प्रेरित करना जैसे तमाम काम रहते हैं। संगीता के पढ़ाना सिर्फ एक नौकरी नहीं है। यह उनका एक मिशन है। संगीता बताती हैं कि मेरे शुरुआती दिनों यहां कक्षाएं खाली रहती थीं। मैं रोती रहती थी। आज कक्षाओं से हंसी के ठहाके और सीखने की ललक गूंजती रहती है। यही मेरे लिए सबसे बड़ा इनाम है।

Get Latest real-time updates

Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.

होमट्रेंड्सSuccess Story: सरकारी अध्यापिका संगीता ने जलाई शिक्षा की अलख, वीरान सरकारी स्कूल की बदल दी तस्वीर
More