Success Story: उत्तर प्रदेश और मध्य के कुछ जिलों के हिस्से को बुंदेलखंड कहा जाता है। भगवान राम की तपोस्थली चित्रकूट भी बुंदेलखंड में आता है। बुंदेलखंड की धरती अब केवल अपनी वीरता के लिए ही नहीं बल्कि ग्रामीण महिलाओं के उद्यमी बनने के हौसले के लिए भी पहचानी जा रही है। यहां बांदा जिले के बबेरू तहसील के कुमहेडा गांव की रहने वाली शिल्पा कुशवाहा ने बड़ी मिसाल पेश की है।
कभी घर में चूल्हा-चौका तक सीमित रहने वाली शिल्पा कुशवाहा ने आज अपने गांव की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर बुंदेली स्वाद को एक नई पहचान दी है। वैसे तो शिल्पा मूल रूप से महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले की रहने वाली हैं। लेकिन अब शिल्पा बुंदेलखंड में ही रच बस गईं हैं। शिल्पा के साथ जुड़ी समूह की अन्य महिलाएं भी दलिया समेत अन्य कई प्रोडक्ट्स बना रही हैं।
गांव में महिलाओं को मिला रोजगार
मिंट हिंदी के साथ बातचीत करते हुए शिल्पा कुशवाहा ने कहा कि वो प्रगति महिला स्वयं सहायता समूह का संचालन करती हैं। इस समूह से कई महिलाएं जुड़ी हुई हैं। समूह की महिलाएं बुंदेलखंड के प्रसिद्ध कठिया गेहूं से दलिया बनाने का काम करती है। इसके साथ ही आम का आचार, सत्तू, और बुंदेलखंड की अन्य पारंपरिक चीजों को बनाती हैं। इन सभी उत्पादों को शिल्पा ने ‘देहाती’ ब्रांड नाम से बाजार में उतारा है। शिल्पा ने बताया कि इस काम को करने में उनके पति भी हाथ बंटाते हैं। शिल्पा घर पर ही दलिया बनाती हैं और उसकी बिक्री का काम उनके पति करते हैं।
दलिया का बिजनेस कैसे हुआ शुरू
मिंट हिंदी से बातचीत में शिल्पा ने कहा कि उनकी आर्थिक स्थति बेहद खराब थी। जीवन में कई तरह की ठोकरें मिली। लेकिन लक्ष्य था कि जीवन में आगे जरूर बढ़ना है। कुछ न कुछ जरूर करना है। बस इसी काम करने के जुनून से शिल्पा को कठिया गेहूं से दलिया बनाने का विचार आया। इसके बाद छोटे स्तर पर साल 2013 में शिल्पा ने कठिया गेहूं से दलिया बनाना शुरू किया।
फिर साल 2014 में एक NGO के साथ जुड़कर थोड़ा बड़े लेवल पर दलिया बनाने का काम को विस्तार किया। दलिया के इस निर्माण के लिए शिल्पा को शुरुआती दौर में सरकार से 20,000 रुपये का लोन मिला। इसके बाद 30,000 रुपये, 50,000 रुपये और 2 लाख रुपये तक लोन मिला। इससे उन्हें अपने बिजनेस को आगे बढ़ाने में मदद मिली। शिल्पा ने बताया कि आज उनके पास बहुत ऑर्डर हैं। कठिया गेहूं की आवक कम होने की वजह से वो पूरी तरह से सप्लाई नहीं कर पाती हैं।
शिल्पा ने कई महिलाओं को बनाया आत्म निर्भर
शिल्पा के साथ आज कई महिलाएं जुड़कर काम कर रही है। उन्होंने गांव की कई महिलाओं को आत्म निर्भर बना दिया है। शिल्पा और उनके साथ जुड़ी महिलाओं की घर बैठे कमाई हो जाती है। शिल्पा कुशवाहा की इस नई पहल से दलिया का पुराना देसी स्वाद फिर से लोगों को मिल रहा है। बुंदेलखंड की यह कहानी बताती है कि यदि हौसले बुलंद हों तो गांव की महिलाएं भी सफलता की नई ऊंचाइयों को छू सकती हैं।
कठिया गेहूं को मिला GI टैग
बता दें कि बुंदेलखंड का कठिया गेहूं पूरी दुनिया में मशहूर है। यह लाल रंग का होता है। इसकी खेती बुंदेलखंड में कई दशकों से हो रही है। बुंदेलखंड के इस गेहूं को GI Tag भी मिला है। ये गेहूं अपने स्वाद के लिए जाना जाता है। कठिया गेहूं की दलिया स्वादिष्ट के साथ सेहत के लिए फायदेमंद मानी जाती है। बुंदेलखंड में यह गेहूं बांदा, हमीरपुर, झांसी, महोबा और ललितपुर में बड़े पैमाने में उगाया जाता है। कमजोर शरीर वालों के लिए ये दलिया बेहद उपयोगी मानी गई। कठिया गेहूं की दलिया को लोग यहां दूध के साथ खाना ज्यादा पसंद करते हैं।