
Success Story: सरकारी स्कूलों को लेकर अक्सर सुविधाओं और पढ़ाई की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं। लेकिन तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले का एक सरकारी स्कूल इसकी बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर दी। यहां एक शिक्षक ने सिर्फ पढ़ाने तक अपनी जिम्मेदारी सीमित नहीं रखी, बल्कि स्कूल के माहौल, बच्चों की पढ़ने की आदत, पर्यावरण और रचनात्मक गतिविधियों पर भी काम किया। इस बदलाव के केंद्र में हैं तमिल शिक्षक बालमुरुगन। उन्होंने 2013 में पेत्थनायकनूर सरकारी हाई स्कूल में जॉइन किया था। उस समय स्कूल में करीब 70 छात्र थे। आज यहां 210 से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं।
साल 2012 में पेत्थनायकनूर सरकारी हाई स्कूल में करीब 70 छात्र थे। आसपास के दूसरे स्कूलों में बच्चों की संख्या इससे कई गुना ज्यादा थी। बेहतर सुविधाओं और स्कूल की छवि के कारण कई परिवार अपने बच्चों को दूसरे सरकारी या प्राइवेट स्कूलों में भेजना पसंद करते थे। 2013 में बालमुरुगन के स्कूल से जुड़ने के बाद बदलाव की शुरुआत हुई। उन्होंने स्कूल की सबसे पहले उस जगह को बदलने पर ध्यान दिया, जहां बच्चे रोज अपना समय बिताते थे।
द बेटर इंडिया में छपी खबर के मुताबिक, साल 2013 से 2015 के बीच स्कूल परिसर में बड़े स्तर पर पौधे लगाए गए। बालमुरुगन के मुताबिक, एक सप्ताह में 110 पौधे लगाए गए थे। इसके बाद पर्यावरण से जुड़ी गतिविधियां स्कूल की पढ़ाई का हिस्सा बनने लगीं। बच्चे स्थानीय बीज इकट्ठा करने लगे, सीड बॉल बनाने लगे और पेड़ लगाने के अभियानों में हिस्सा लेने लगे। समय के साथ स्कूल और आसपास के इलाके में 960 से ज्यादा पौधे लगाए गए। बच्चों ने करीब 45,000 सीड बॉल भी तैयार किए। इसका उद्देश्य सिर्फ पेड़ लगाना नहीं था। शिक्षक चाहते थे कि बच्चों को पर्यावरण किताबों से नहीं, बल्कि अपने अनुभव से समझ में आए।
स्कूल में पढ़ाई को सिर्फ किताब के पाठ तक सीमित रखने के बजाय बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने पर भी काम हुआ। स्कूल की छोटी लाइब्रेरी धीरे-धीरे बड़ी होती गई और आज वहां 6,000 से ज्यादा किताबें हैं। इन किताबों को जुटाने में शिक्षकों के अलावा लेखकों, रीडिंग ग्रुप, सामाजिक संगठनों और दूसरे लोगों ने भी मदद की। बालमुरुगन ने खुद भी किताबें खरीदने के लिए करीब ₹24,000 खर्च किए। अब बच्चे सिर्फ किताबें पढ़ते नहीं हैं, बल्कि अपनी कविताएं, कहानियां और लेख भी लिखते हैं।
स्कूल में पढ़ने की आदत ने बच्चों में लिखने का आत्मविश्वास भी बढ़ाया। छात्रों की कविताएं, कहानियां और लेख किताबों के रूप में प्रकाशित हुए। स्कूल की छात्रा तमिल अरसी का पर्यावरण संरक्षण पर लिखा लेख तमिलनाडु सरकार की छात्र पत्रिका थेनचिट्टू में भी प्रकाशित हुआ। यानी स्कूल में बच्चे सिर्फ दूसरे लेखकों की किताबें पढ़ने तक सीमित नहीं रहे। उन्हें यह मौका भी मिला कि उनकी अपनी रचनाएं दूसरे लोग पढ़ें।
स्कूल के क्लासरूम को रंग-बिरंगे ट्रेन के डिब्बों जैसा बना दिया गया। इस पूरे बदलाव पर करीब ₹50,000 खर्च हुए। इसमें बालमुरुगन ने खुद ₹35,000 दिए, जबकि बाकी ₹15,000 माता-पिता ने मिलकर दिए। बच्चों के लिए स्कूल का माहौल अचानक काफी अलग हो गया। कक्षा 10 की छात्रा मणिमेकलाई ने बताया कि कोविड के बाद जब बच्चे स्कूल लौटे तो सभी क्लासरूम ट्रेन के डिब्बों जैसे देखकर हैरान रह गए। स्कूल ने संगीत और उत्सव के साथ बच्चों का स्वागत किया। यही छोटी-सी पहल बच्चों के लिए स्कूल लौटने की यादगार शुरुआत बन गई।
स्कूल में शिक्षा का दायरा सिर्फ किताबों तक नहीं रखा गया। बच्चों को परई इसई, मयिलाट्टम, ओयिलाट्टम, करगट्टम, कवडियाट्टम और कुम्मी जैसी तमिल लोक कलाओं की ट्रेनिंग दी जाती है। स्कूल की छात्रा मणिमेकलाई के मुताबिक नियमित पढ़ाई के बाद बच्चों को करीब दो घंटे लोक कलाओं की ट्रेनिंग मिलती है। इसके अलावा बच्चे पेड़ लगाने और खेल गतिविधियों में भी हिस्सा लेते हैं। इससे बच्चों को पढ़ाई के साथ अपनी संस्कृति से जुड़ने का मौका भी मिलता है।
इस पूरे बदलाव का सबसे बड़ा असर स्कूल के एनरोलमेंट पर दिखाई देता है। 2012 में जहां स्कूल में करीब 70 बच्चे थे, वहीं अब यह संख्या 210 से ज्यादा हो चुकी है। स्कूल की हेडमिस्ट्रेस उमामहेश्वरी के मुताबिक, माता-पिता अब बच्चों को इस स्कूल में इसलिए भेजते हैं क्योंकि उन्हें बच्चों में अनुशासन, आत्मविश्वास और जिम्मेदारी दिखाई देती है। यानी स्कूल की बदली हुई तस्वीर ने धीरे-धीरे माता-पिता का भरोसा भी वापस हासिल किया।
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