नौकरी के लिए रोज 200 किमी कानपुर से लखनऊ का सफर, इस टेक प्रोफेशनल ने कैसे संभाला काम और परिवार?

कानपुर से लखनऊ रोजाना 200 किलोमीटर सफर करने वाली टेक प्रोफेशनल खुशी श्रीवास्तव ने नौकरी, परिवार और कंटेंट क्रिएशन को साथ‑साथ संभाला। पांच महीने तक कठिन सफर के बाद वह लखनऊ शिफ्ट हो गईं और अब काम और पैशन दोनों को बैलेंस कर रही हैं।

Priya Shandilya
अपडेटेड3 Dec 2025, 01:09 PM IST
नौकरी के लिए रोज 200 किमी का सफर
नौकरी के लिए रोज 200 किमी का सफर

हर दिन दफ्तर जाना आम बात है, लेकिन अगर दफ्तर 100 किलोमीटर दूर हो तो? यही कहानी है 22 साल की टेक प्रोफेशनल खुशी श्रीवास्तव की, जिसने पांच महीने तक कानपुर से लखनऊ रोजाना सफर किया। ट्रेन, ऑटो और फिर नौ घंटे की नौकरी, सबके बीच उसने कंटेंट क्रिएशन का शौक भी जिंदा रखा।

कानपुर से लखनऊ तक का सफर

खुशी ने कंप्यूटर एप्लीकेशन में ग्रेजुएशन के बाद एक बड़ी MNC में नौकरी पाई। ट्रेनिंग चेन्नई में हुई, पोस्टिंग केरल में मिली, लेकिन परिवार की वजह से उसने ट्रांसफर की मांग की। फरवरी 2025 में लखनऊ ऑफिस में उसकी पोस्टिंग हुई। अब चुनौती थी रोजाना कानपुर से लखनऊ आना‑जाना।

सुबह 5:30 से रात 11 बजे तक की दिनचर्या

हिंदुस्तान टाइम्स संग बातचीत में उन्होंने अपनी डेली रूटीन के बारे में बताया। खुशी की दिनचर्या सुबह 5.30 बजे से शुरू होती है। फिर तैयार होकर वे 7.30 बजे लखनऊ के लिए ट्रेन पकड़ती हैं और फिर 9 बजे लखनऊ पहुंचती हैं। चारबाग स्टेशन से गोमती नगर ऑफिस तक 15 किलोमीटर ऑटो से सफर करना पड़ता है। दिन भर के ऑफिस वर्क के बाद शाम को फिर वही ट्रेन पकड़कर कानपुर लौटती हैं। रात 11 बजे तक घर पहुंचती हैं और अगले दिन फिर वही रूटीन।

कितना हो जाता है खर्च?

मासिक ट्रेन पास 300 और रोजाना ऑटो किराया 40। यानी एक तरफ का सफर लगभग 55 में पूरा होता। सफर में लगने वाला खर्च ज्यादा नहीं था लेकिन इसकी वजह से खुशी की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा था। वर्क‑लाइफ बैलेंस लगभग खत्म हो गया था। लगभग पांच महीने तक यह कठिन सफर करने के बाद जून में उन्होंने लखनऊ शिफ्ट होने का फैसला किया। हफ्तों तक घर ढूंढने के बाद चिनहट में एक कमरा मिला, जहां वह अपनी मां के साथ रहती हैं। किराया और बिजली मिलाकर 5,000 खर्च होता है।

सैलरी और कंटेंट क्रिएशन

खुशी मानती है कि उसकी सैलरी ज्यादा नहीं है, लेकिन कंटेंट क्रिएशन ने मदद की है। इंस्टाग्राम पर उसके 18,000 फॉलोअर्स हैं और यूट्यूब चैनल भी मोनेटाइज हो चुका है। ब्रांड कोलैबोरेशन से उसे अतिरिक्त कमाई होती है। यही उसकी पैशन और सपोर्ट सिस्टम है।

खुशी की कहानी काफी प्रेरणादायक है। उन्होंने ये साबित कर दिया कि लंबा सफर और चुनौतियां भी इंसान को रोक नहीं सकतीं। उन्होंने नौकरी, परिवार और कंटेंट क्रिएशन तीनों को बैलेंस किया। अब लखनऊ में रहकर वह थोड़ी राहत महसूस करती है, लेकिन उनका जज्बा और मेहनत ही असली प्रेरणा है।

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