UGC रेग्युलेशन पर सुप्रीम कोर्ट के मन में उठे चार सवाल, क्या आप भी यही सोच रहे हैं?

UGC Equity Bill: यूजीसी के नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चार पैमानों पर परखा जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने रेग्युलेशनों के खिलाफ दायर याचिकां पर गुरुवार को सुनवाई की और चार सवाल तैयार किए। आइए जानते हैं ये चार सवाल कौन-कौन से हैं?

Naveen Kumar Pandey( विद इनपुट्स फ्रॉम भाषा)
अपडेटेड30 Jan 2026, 10:06 AM IST
यूजीसी रेग्युलेशन पर सुप्रीम कोर्ट ने तैयार किए चार सवाल
यूजीसी रेग्युलेशन पर सुप्रीम कोर्ट ने तैयार किए चार सवाल(HT PHOTO)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु) विनियम, 2026 को चुनौती देने वाली याचिकाओं में कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं। उच्चतम न्यायालय ने विचार के लिए ऐसे चार सवाल तैयार किए हैं। शीर्ष अदालत ने शैक्षणिक संस्थानों के परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के हालिया समानता नियमों पर गुरुवार को रोक लगा दी।

खतरनाक और विभेदकारी हो सकते हैं प्रावधान

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रारूप 'प्रथम दृष्टया अस्पष्ट' है, इसके 'बहुत व्यापक परिणाम' हो सकते हैं और इसका प्रभाव 'खतरनाक रूप से' समाज को विभाजित करने वाला भी हो सकता है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि यूजीसी रेग्युलेशनों में 'कुछ अस्पष्टताएं' हैं और 'इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है।' शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया उसका यह मत है कि निम्नलिखित चार महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न विचारणीय हैं और इनके लिए विस्तृत पड़ताल की आवश्यकता होगी।

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क्या यूजीसी रग्युलेशन की धारा 3(सी) तार्किक है?

पहला प्रश्न यह है कि क्या रेग्युलेशन में 'जाति आधारित भेदभाव' को परिभाषित करने वाली धारा 3(सी) को शामिल करना 2026 के यूजीसी विनियमों के उद्देश्य और प्रयोजन की पूर्ति के लिए उचित और तर्कसंगत है? सुप्रीम कोर्ट खासकर इसलिए यह पता करना चाहता है क्योंकि जाति आधारित भेदभाव से निपटने के लिए कोई अलग या विशेष प्रक्रियात्मक तंत्र निर्धारित नहीं किया गया है। दूसरी तरफ, रेग्युलेशन की धारा 3(ई) के तहत 'भेदभाव' की व्यापक और समावेशी परिभाषा प्रदान की गई है।

क्या रेग्युलेशनों से जातिगत भेदभाव को रोकने का उद्देश्य पूरा होता है?

न्यायालय के मुताबिक, दूसरा प्रश्न यह है कि क्या रेग्युलेशन के तहत 'जाति-आधारित भेदभाव' शामिल करना और और लागू करने से अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अंतर्गत सबसे पिछड़ी जातियों के मौजूदा संवैधानिक और वैधानिक उप-वर्गीकरण पर कोई प्रभाव पड़ेगा? क्या यह रेग्युलेशन ऐसी अत्यंत पिछड़ी जातियों को भेदभाव और संरचनात्मक असमानताओं से पर्याप्त एवं प्रभावी सुरक्षा प्रदान करता है?

क्या रेग्युलेशन के प्रावधान नागरिकों को संविधान से मिली गारंटी छीनते हैं?

तीसरा सवाल यह है कि छात्रावासों, कक्षाओं, मार्गदर्शन समूहों या इसी तरह की शैक्षणिक या आवासीय व्यवस्थाओं के आवंटन की प्रकिया पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण मानदंडों पर आधारित होने के बावजूद रेग्युलेशन के खंड 7(घ) में 'पृथक्करण' शब्द को शामिल करना उचित होगा? क्या इससे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और संविधान की प्रस्तावना के तहत समानता और बंधुत्व की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन नहीं होगा?

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रैगिंग को भेदभाव नहीं बताना उचित है?

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, चौथा सवाल यह है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता का संवर्द्धन) विनियम 2012 में 'रैगिंग' शब्द मौजूद तो है, लेकिन रेग्युलेशन में भेदभाव के एक विशिष्ट रूप के तौर पर इसे शामिल नहीं किया गया है। क्या कानून की नजर में यह एक चूक है? शीर्ष अदालत की तीन न्यायाधीशों की पीठ 19 मार्च को इस मामले की सुनवाई करेगी।

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