
पौराणिक परंपरा के अनुसार सृष्टि के आरंभ में सम्पूर्ण जगत अंधकारमय था। कहीं कोई प्रकाश नहीं था। इसी अवस्था में कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। 'कमलयोनि' कहे जाने का कारण यह है कि पौराणिक परंपरा में ब्रह्मा जी का जन्म भगवान विष्णु की नाभि से निकले कमल-पुष्प से हुआ बताया जाता है।
ब्रह्मा जी के मुख से जब पहला शब्द निकला, तो वह ॐ था। यही ॐ सूर्य के तेज का सूक्ष्मतम रूप माना गया है। इसके पश्चात ब्रह्मा जी के चार मुखों से चारों वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद प्रकट हुए, जो स्वयं तेज से दीप्तिमान थे। ये चारों वेद ॐ के तेज में समाहित होकर एकाकार हो गए।
इसी वैदिक तेज को आदित्य कहा गया, क्योंकि यह सृष्टि के आरंभ में सबसे पहले प्रकट हुआ। यह तेज ही विश्व का अविनाशी कारण माना गया अर्थात इसी वेद-स्वरूप सूर्य से सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार, तीनों होते हैं। मार्कंडेय पुराण में सूर्य को स्वयं ब्रह्म-स्वरूप बताया गया है, जो ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र तीनों रूप धारण कर सृजन, पालन और संहार करते हैं।
सूर्य का यह मूल तेज इतना प्रचंड था कि ब्रह्मा जी ने स्वयं सूर्य से प्रार्थना की। इस प्रार्थना पर सूर्य ने अपने महातेज को समेट लिया और सीमित तेज को ही धारण किया, जिससे सृष्टि इस तेज को सहन कर सके।
सृष्टि-रचना के क्रम में ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि के पुत्र हुए ऋषि कश्यप, जिन्हें प्रजापति भी कहा जाता है। ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ, जो दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं।
देवी अदिति ने घोर तप के द्वारा भगवान सूर्य को प्रसन्न किया। प्रसन्न होकर सूर्य ने अदिति की इच्छा-पूर्ति के लिए सुषुम्ना नामक किरण के माध्यम से उनके गर्भ में प्रवेश किया। कुछ कथा-प्रसंगों में इस तपस्या का संदर्भ यह भी मिलता है कि देवासुर संग्राम में असुरों से पराजित देवताओं की रक्षा के लिए अदिति ने यह तप किया था और सूर्य से अपने पुत्र रूप में जन्म लेने का वरदान मांगा था। अलग-अलग पुराणों में इस प्रसंग के विवरण में कुछ भिन्नता मिलती है, किंतु मूल कथासूत्र 'अदिति की तपस्या और सूर्य का उनके गर्भ में अंश-रूप में प्रवेश' सभी में समान है।
गर्भावस्था में भी अदिति ने तप का त्याग नहीं किया। वे चांद्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन करती रहीं। चांद्रायण व्रत में चंद्रमा की घटती-बढ़ती कलाओं के अनुसार भोजन की मात्रा घटाई-बढ़ाई जाती है, और यह अत्यंत कठोर तपस्या मानी जाती है। इस निरंतर व्रत-पालन से अदिति क्षीण होती जा रही थीं।
अपनी पत्नी को इस प्रकार क्षीण होते देख ऋषि कश्यप ने क्रोधित होकर अदिति से पूछा, 'तुम इस प्रकार उपवास करके गर्भस्थ शिशु को क्यों मारना चाहती हो?' पति के इस कथन को सुनकर देवी अदिति ने गर्भ के बालक को उदर से बाहर कर दिया। यह बालक अपने अत्यंत दिव्य तेज से प्रज्वलित हो रहा था।
भगवान सूर्य शिशु रूप में इसी गर्भ से प्रकट हुए। चूंकि यह गर्भ अंडे के आकार का था और कश्यप द्वारा उसे 'मृत' कह दिए जाने के बाद अदिति ने उसे बाहर निकाला था, इसलिए इस बालक का नाम मार्तंड पड़ा। कई ग्रंथों में इस नाम का अर्थ 'मृत अंड से उत्पन्न' बताया गया है- 'मृत' और 'अंड' शब्दों के संयोग से यह नाम बना।
ब्रह्म पुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के इस अंश को विवस्वान कहा गया है। पौराणिक परंपरा में विवस्वान को सूर्य का ही एक रूप माना जाता है, जिनसे आगे चलकर मनु (मानव जाति के आदिपुरुष) की उत्पत्ति हुई, इसीलिए मनु को वैवस्वत मनु भी कहा जाता है।
Disclaimer: यह कथा इंटरनेट पर उपलब्ध स्रोतों से ली गई है। कथा के इस स्वरूप को लेकर मिंट हिंदी का कोई दावा नहीं है। ज्ञानीजन ही भगवान की सूर्य की उत्पत्ति पर विशेष प्रकाश डाल सकते हैं।
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