प्रभास की बहुप्रतीक्षित फिल्म द राजा साब एक लापता दादा की तलाश की कहानी है। लेकिन लगभग तीन घंटे की इस फिल्म में दर्शक सिर्फ दादा को ही नहीं, बल्कि मजबूत कहानी, दमदार किरदार, डर और सच्चा मनोरंजन भी ढूंढते रह जाते हैं। फिल्म में साफ दिशा और संतोषजनक अंत की कमी साफ महसूस होती है।
फिल्म की शुरुआत राजा (प्रभास) से होती है, जो अपनी दादी गंगम्मा (जरीना वहाब) के साथ रहता है। गंगम्मा अल्जाइमर की मरीज हैं और उन्हें सिर्फ अपने लापता पति कनकराजू (संजय दत्त) और पोते की याद रहती है। वह राजा से बार-बार अपने दादा को ढूंढने को कहती हैं, जो उन्हें सपनों में दिखते हैं।
एक सुराग मिलने पर राजा हैदराबाद जाता है। कई रहस्यमयी घटनाओं के बाद वह एक भूतिया महल में पहुंचता है, जो उसके दादा का है। महल का राज क्या है? दादी के सपनों का मतलब क्या है? क्या राजा अपने दादा से मिल पाएगा? इन सवालों को फिल्म बहुत लंबा खींचती है, लेकिन नए या रोचक विचार नहीं दे पाती।
निर्देशक मारुति की यह फिल्म बुनियादी कहानी कहने में कमजोर है। हॉरर-कॉमेडी का आइडिया ठीक लगता है, लेकिन कमजोर पटकथा इसे शोर भरी, बेकार और उबाऊ बना देती है। फिल्म में भूत-प्रेत, झाड़-फूंक, हिप्नोसिस और तांत्रिक क्रियाएं सब कुछ ठूंस दी गई हैं, जिससे कहानी बिखर जाती है।
कहानी कभी गांव, कभी हैदराबाद और कभी उसके आसपास बिना किसी ठोस वजह के घूमती रहती है। प्रभास का किरदार नेकदिल और मजाकिया है, लेकिन उसमें गहराई नहीं है। उसके माता-पिता का क्या हुआ, वह दादी के साथ क्यों रहता है—इन सवालों के जवाब नहीं मिलते।
भूतिया महल में डर के बीच भी किरदार पार्टी करते हैं, सजे-धजे कपड़ों में नजर आते हैं, जो कहानी को मजाक बना देता है। कमजोर वीएफएक्स, साफ दिखने वाला ग्रीन स्क्रीन और प्रभास पर जरूरत से ज्यादा इफेक्ट्स फिल्म को और खराब बनाते हैं। 400 करोड़ रुपये के बजट के हिसाब से नतीजा बेहद निराशाजनक है।
हिप्नोसिस और एक्सॉर्सिज़्म जैसे विषयों में थोड़ी संभावना दिखती है, लेकिन उन्हें ठीक से दिखाया नहीं गया। प्रभास की कॉमिक टाइमिंग कुछ दृश्यों में अच्छी है, खासकर अस्पताल वाला सीन। लेकिन ऐसे पल बहुत कम हैं।
मालविका मोहनन, निधि अग्रवाल और रिद्धि कुमार को सही ढंग से इस्तेमाल नहीं किया गया; वे सिर्फ सजावटी किरदार बनकर रह जाती हैं। खराब एडिटिंग भी कहानी की कमजोरियों को उजागर करती है।
कुल मिलाकर, द राजा साब अपना भारी बजट बिखरी हुई कहानी में बर्बाद कर देती है। प्रभास के कुछ मजेदार पलों के बावजूद, फिल्म में गहराई, तालमेल और मजबूत कहानी की कमी है। जो एक मजेदार हॉरर-कॉमेडी बन सकती थी, वह एक उबाऊ और बेस्वाद तीन घंटे की फिल्म बनकर रह जाती है।