
भावार्थ : मूर्ख व्यक्ति से सदा दूरी बनाए रखनी चाहिए, क्योंकि वह साक्षात दो पैरों वाला पशु है। वह अपनी वाणी के शूल से उसी प्रकार बेधता है, जैसे कोई अदृश्य कांटा जो दिखता नहीं, पर चुभता गहरा है।
साधारणतः हम मूर्ख उसे मानते हैं जो पढ़ा-लिखा नहीं, जिसे सांसारिक ज्ञान नहीं। किन्तु चाणक्य की दृष्टि इससे कहीं सूक्ष्म और कठोर है। उनके लिए मूर्खता केवल अज्ञान नहीं, वरन विवेकहीनता है। वह अवस्था जिसमें व्यक्ति जानते हुए भी नहीं समझता, सुनकर भी नहीं सीखता, और बोलते हुए नहीं सोचता। ऐसा व्यक्ति शास्त्र पढ़ा हुआ भी हो सकता है, पद-प्रतिष्ठा से युक्त भी, किन्तु यदि उसकी वाणी और व्यवहार विवेक से रहित है, तो चाणक्य उसे दोपाया पशु कहने में तनिक भी संकोच नहीं करते।
प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः। यह पंक्ति सुनने में कठोर लगती है, परंतु इसमें एक गहरी दार्शनिक सच्चाई छिपी है। पशु और मनुष्य में अंतर केवल आकृति का नहीं, चेतना का है। पशु प्रवृत्ति से चलता है, भूख, भय, क्रोध। मनुष्य को विवेक मिला है ताकि वह प्रवृत्तियों से ऊपर उठे। जो मनुष्य इस विवेक का उपयोग नहीं करता, जो बिना सोचे बोलता है, बिना परिणाम समझे आचरण करता है, वह देह से मनुष्य होकर भी आत्मा से पशु ही है। भारतीय दर्शन में मनुष्य-जन्म को दुर्लभ कहा गया है और उस दुर्लभता का सार विवेक में है। जो विवेक से च्युत है, उसने वस्तुतः मनुष्यता खो दी।
श्लोक का सबसे मार्मिक अंश है- वाक्यशूलेन भिनत्ति। शूल अर्थात् त्रिशूल जैसा नुकीला अस्त्र। मूर्ख की वाणी शूल की भांति होती है। वह ऐसा घाव करती है जो दिखता नहीं, जैसे घास में छिपा कांटा। लोहे की तलवार से लगा घाव दिखता है, उसका उपचार होता है। किन्तु किसी के अनजाने में, बेपरवाही से, या द्वेष से कहे गए शब्द भीतर उतरते हैं और वर्षों तक टीसते रहते हैं। समाज में ऐसे अनगिनत 'वाक्यशूल' हैं। सभाओं में, परिवारों में, कार्यस्थलों में। जो पल भर की मूर्खता से दशकों का संबंध नष्ट कर देते हैं।
परिहर्तव्यः अर्थात परिहार करो, दूरी बनाओ। यह पलायन नहीं, विवेकपूर्ण आत्मरक्षा है। चाणक्य व्यावहारिक दर्शन के आचार्य हैं। वह जानते हैं कि मूर्ख को बदलना प्रायः असंभव है, क्योंकि वह अपनी मूर्खता से अनभिज्ञ है। बुद्ध ने भी कहा है कि मूढ़ के साथ संगति दुःख का मूल है। उपनिषदों में सत्संग का जो महत्त्व बताया गया है, वह भी वस्तुतः इसी का दूसरा पहलू है। श्रेष्ठ के साथ रहो, ताकि मूर्ख के वाक्यशूल से बचो। आधुनिक मनोविज्ञान भी इसे toxic relationship (जहरीले रिश्ते) से दूरी के रूप में स्वीकार करता है।
आज का युग चाणक्य के इस श्लोक की प्रासंगिकता को कई गुना बढ़ा देता है। सामाजिक माध्यमों पर प्रतिदिन लाखों वाक्यशूल चलते हैं। बिना सोचे, बिना प्रमाण के, बिना परिणाम की चिंता किए। वहां मूर्खता को मत का दर्जा मिल गया है और अविवेक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कवच। चाणक्य का परिहर्तव्यः आज भी उतना ही सार्थक है डिजिटल दूरी भी एक बुद्धिमत्ता है।
चाणक्य का यह श्लोक कठोरता की भाषा में करुणा का संदेश देता है। वे हमें सिखाते हैं कि अपनी ऊर्जा, समय और मानसिक शांति, ये अमूल्य संसाधन हैं। इन्हें किसी के वाक्यशूल की बलिवेदी पर नहीं चढ़ाना चाहिए। साथ ही, यह आत्मपरीक्षण का भी आह्वान है कि कहीं हम स्वयं तो किसी के जीवन में अदृश्य कंटक नहीं बन रहे? विवेकवान वह है जो दूसरों की मूर्खता से बचे और अपनी मूर्खता को पहचाने।
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