
भावार्थ : राजा लोग कुलीनों का संग्रह इस निमित्त करते हैं कि, 'वे आदि अर्थात् उन्नति, मध्य अर्थात् साधारण और अंत अर्थात् विपत्ति में राजा को नहीं छोड़ते।
चाणक्य के नीतिशास्त्र में यह श्लोक एक ऐसे प्रश्न का उत्तर है जो हर युग के नेतृत्व को मथता रहा है कि किस पर विश्वास किया जाए? किसे पास रखा जाए? किसे वह स्थान दिया जाए जहां से राज्य की नस पकड़ी जा सके? चाणक्य का उत्तर संक्षिप्त और निर्णायक है- कुलीन को। और कारण भी वे स्वयं देते हैं। चाणक्य कहते हैं कि कुलीन आदि, मध्य और अवसान अर्थात आरम्भ में, संघर्ष के मध्य में, और अंत के अंधेरे में भी राजा का साथ नहीं छोड़ते।
यहां कुलीन शब्द को केवल जन्म से जोड़ना चाणक्य के साथ अन्याय होगा। चाणक्य स्वयं एक साधारण कुल में जन्मे थे, किन्तु उनका सम्पूर्ण जीवन कुलीनता का प्रमाण था। कुल का अर्थ यहां है- वह संस्कार-परम्परा जिसमें व्यक्ति ने जीवन-मूल्य ग्रहण किए। कुलीन वह है जिसे निष्ठा, धर्म और कृतज्ञता की शिक्षा अपने परिवेश से मिली है।
राजा इन कुलीनों का संग्रह करते हैं। यह शब्द महत्त्वपूर्ण है। संग्रह केवल नियुक्ति नहीं, वरन सचेत चयन है। जैसे रत्न-परीक्षक बाजार में से रत्न चुनता है, वैसे ही बुद्धिमान राजा समाज में से कुलीन को पहचानकर अपने निकट रखता है। यह संग्रह राजनीतिक रणनीति नहीं, मानवीय विवेक है।
गीता के सतरहवें अध्याय में कहा गया है, 'सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत', अर्थात व्यक्ति की श्रद्धा उसके सत्त्व के अनुरूप होती है। कुलीन का सत्त्व ऐसा होता है जो परिस्थिति के दबाव में टूटता नहीं। वह सुख में जितना स्थिर है, संकट में भी उतना ही। यही आदिमध्यावसानेषु का तात्पर्य है।
यह तीन शब्द आदि, मध्य और अवसान, सम्पूर्ण जीवन-चक्र के प्रतीक हैं। आदि अर्थात जब सब कुछ नया है, संभावनाएं हैं, उत्साह है, तब तो सभी साथ देते हैं। मध्य अर्थात जब कार्य की कठिनाई प्रकट होती है, संशय उठते हैं, तब अधिकांश शिथिल पड़ने लगते हैं। और अवसान, जब पतन की आशंका हो, जब राज्य संकट में हो, जब संगति में जोखिम हो, तब केवल कुलीन टिका रहता है। वेदांत की भाषा में यह गुणातीत स्थिरता के निकट है। जो बाहरी परिस्थिति से विचलित न हो, वही सच्चा सहचर है।
चाणक्य यहां परोक्ष रूप से अवसरवाद की आलोचना कर रहे हैं। हर दरबार में, हर संगठन में, हर राजनीतिक समूह में ऐसे लोग होते हैं जो शक्ति के सूर्य की दिशा में मुंह करके खड़े होते हैं। जब राजा उदित हो, वे सबसे आगे हों। जब ग्रहण लगे, वे अदृश्य हो जाएँ। इन्हें चाणक्य ने अन्यत्र "मधुमक्खी" कहा है — फूल खिला तो आए, मुरझाया तो उड़ गए।
कुलीन इससे भिन्न है। उसकी निष्ठा फल से नहीं, सम्बन्ध से जन्मती है। कृतज्ञता उसका स्वभाव है, स्वार्थ उसकी भाषा नहीं। महाभारत में विदुर का चरित्र इसी कुलीनता का आदर्श है — वे जानते थे कि सत्य कहने का मूल्य चुकाना पड़ सकता है, फिर भी वे धृतराष्ट्र के दरबार में पदे पदे सत्य बोलते रहे। यह कुलीन धर्म था।
आज के संगठनों, चाहे वे कॉर्पोरेट हों, मीडिया संस्थान हों, या राजनीतिक दल, सभी इस श्लोक की परीक्षा से गुजरते हैं। जब कोई संस्था कठिनाई में होती है, तब उसके इर्द-गिर्द के लोगों का वास्तविक चरित्र प्रकट होता है। जो संकट में साथ हों, वे ही वास्तविक कुलीन हैं, चाहे उनका जन्म कहीं भी हुआ हो।
चाणक्य का परामर्श आज भी उतना ही व्यावहारिक है। चाणक्य कहते हैं- नेतृत्व को चाहिए कि वह कुलीन की पहचान उत्कर्ष के काल में नहीं, संकट के काल में करे। जो अवसान में न छोड़े, वही आदि में भी विश्वसनीय है।
यह श्लोक अंततः एक गहरे सत्य की ओर संकेत करता है कि राज्य की शक्ति उसके स्वर्ण-भंडार में नहीं, उसके कुलीन सहचरों में होती है। क्योंकि स्वर्ण छिन सकता है, किन्तु एक सच्चे कुलीन की निष्ठा अमूल्य है, अजेय है।
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