
भावार्थ : उस गाय से क्या लाभ है जो न दूध दे, ना बछड़ा और ऐसे पुत्र हुए से क्या लाभ जो न विद्वान हुआ, न ईश्वर-भक्त?
चाणक्य की नीति में कोमलता नहीं, केवल सत्य है। वे पूछते हैं कि उस गाय से क्या प्रयोजन जो न दुग्ध देती है, न गर्भधारण करती है? फिर उसी तीक्ष्ण तर्क को मनुष्य पर लागू करते हैं कि उस पुत्र का क्या अर्थ जो न विद्वान है, न भक्तिमान? श्लोक का शाब्दिक भावार्थ इतना ही है, किंतु इसके भीतर जो दार्शनिक और सामाजिक स्वर है, वह केवल एक पंक्ति का नहीं, एक पूरी सभ्यता की चिंता का है। चाणक्य गाय की उपमा देते हैं क्योंकि गाय भारतीय समाज में केवल पशु नहीं, उपयोगिता और करुणा का प्रतीक रही है। जो गाय इन दोनों अर्थों में निष्फल है, वह भार है। और जो पुत्र विद्या और भक्ति दोनों से रिक्त है, वह कुल के लिए भार है।
चाणक्य ने धन, बल, या प्रतिष्ठा को मानदण्ड नहीं चुना। उन्होंने विद्या और भक्ति को चुना। यह आकस्मिक नहीं है। विद्या वह है जो मनुष्य को जगत् के साथ सम्यक् व्यवहार करना सिखाती है, जो तर्क और विवेक को पैना करती है, जो दूसरों के लिए उपयोगी बनाती है। भक्ति वह है जो भीतर की आग को दिशा देती है, जो अहंकार को गलाकर समर्पण में बदलती है, जो मनुष्य को केवल सफल नहीं, सार्थक बनाती है। इन दोनों के बिना जो पुत्र है, वह केवल शरीर है। मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है कि 'परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात्' अर्थात् जो विवेकशील है, वही जीवन की सार्थकता खोज पाता है। चाणक्य का श्लोक उसी विवेक को भिन्न कोण से कहता है।
कोई भी माता-पिता यह सुनना नहीं चाहता कि उनका पुत्र निरर्थक है। चाणक्य जानते थे यह। फिर भी उन्होंने यह श्लोक रचा। क्यों? क्योंकि भारतीय दार्शनिक परम्परा में उपमा केवल अलंकार नहीं, वह बोध का सबसे सीधा मार्ग है। गाय की उपमा देकर चाणक्य यह स्थापित करते हैं कि मनुष्य जन्म लेने से ही श्रेष्ठ नहीं हो जाता। उसे अर्जन करना होता है। यह विचार गीता के उस सार से मिलता है जहां श्रीकृष्ण कहते हैं कि जन्म से नहीं, कर्म से वर्ण निर्धारित होता है। चाणक्य एक कदम आगे जाकर कहते हैं कि कर्म का सबसे प्रथम रूप है, विद्या का अर्जन और भक्ति का संस्कार। इन दोनों के बिना मनुष्य का जन्म उस पशु से भिन्न नहीं जो समाज के लिए कुछ नहीं कर पाता।
प्राचीन भारतीय समाज में पुत्र केवल व्यक्तिगत सुख का विस्तार नहीं था। वह कुल की निरंतरता था, पितरों के तर्पण का माध्यम था, समाज की अगली पीढ़ी का निर्माण था। इसलिए जब चाणक्य पूछते हैं कि ऐसे पुत्र का क्या अर्थ, तो वे एक व्यक्ति से नहीं, एक सामाजिक संस्था से प्रश्न पूछ रहे हैं। जो पुत्र न विद्वान है, न भक्तिमान, वह कुल को न गौरव दे सकता है, न आध्यात्मिक उत्तराधिकार। वह समाज में न ज्ञान का प्रसार करेगा, न नैतिक आदर्श स्थापित करेगा। इस दृष्टि से यह श्लोक एक व्यक्तिगत आक्षेप नहीं, एक सामाजिक चेतावनी है कि संतान को केवल जन्म देना पर्याप्त नहीं, उसे संस्कारित करना पड़ता है।
आज जब हम डिग्रियों को विद्या समझ बैठे हैं और सफलता को भक्ति का पर्याय मान लिया है, तब चाणक्य का यह श्लोक और भी तीखा लगता है। विश्वविद्यालयों से निकलने वाले असंख्य युवाओं में कितने वास्तव में विद्वान हैं? और भक्ति तो आज उपहास का विषय बन गई है, जैसे वह दुर्बल चित्त का चिह्न हो। किंतु जिस समाज में विद्या और भक्ति दोनों क्षीण हों, वहां पीढ़ियां केवल उपभोक्ता बनती हैं, निर्माता नहीं। चाणक्य की गाय की उपमा तब और भी सटीक हो जाती है। वह गाय जो न दूध दे न बछड़ा, वह केवल घर का स्थान घेरती है। और वह पीढ़ी जो न ज्ञान दे न श्रद्धा, वह केवल समय घेरती है। प्रश्न यह है कि क्या हमने आज उस गाय को पहचाना है, और क्या हमें उसकी पहचान करने का साहस है?
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