
भावार्थ : पुत्र को पांच वर्ष तक दुलारें, पांच से दस वर्ष तक अनुशासन में रखें, और जब पुत्र 16 वर्ष का हो जाए तो उसके साथ मित्र के समान आचरण करें।
चाणक्य नीति का यह श्लोक मनुष्य-निर्माण की एक ऐसी रूपरेखा है जिसे आचार्य ने महज तीन पंक्तियों में समेट दिया। पहले पांच वर्ष बच्चे को लाड़-प्यार से पालो। अगले दस वर्ष अनुशासन के साथ गढ़ो और जब वह सोलहवें वर्ष में प्रवेश करे, तो उससे मित्र की तरह व्यवहार करो। यह श्लोक एक पालन-पद्धति नहीं, एक दर्शन है। मनुष्य की चेतना के तीन स्तरों को पहचानने का दर्शन।
जन्म से पांच वर्ष तक का शिशु एक कोमल मिट्टी की तरह होता है। उसकी स्मृति में जो अंकित होता है, वह जीवन भर नहीं मिटता। चाणक्य का लालयेत् केवल दुलार का आदेश नहीं है, अपितु यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य की स्वीकृति है। इस अवस्था में बालक अनुशासन से नहीं, अनुभव से सीखता है।
उसे यदि भय का वातावरण मिला, तो वह भीरु बनेगा; यदि उपेक्षा मिली, तो वह आत्महीन रहेगा; और यदि प्रेम मिला, तो उसकी जड़ें गहरी होंगी। आधुनिक मनोविज्ञान में जॉन बॉल्बी का संलग्नता सिद्धांत (Attachment Theory) यही कहता है। इसके सिद्धांत के अनुसार, शैशव का सुरक्षित स्नेह-बंधन ही व्यक्तित्व की नींव है। चाणक्य ने यह बात उससे सदियों पहले कह दी थी।
छह से पंद्रह वर्ष की आयु में ताडयेत् का अर्थ शारीरिक दंड नहीं है, अपितु यह व्याख्या सतही और भ्रामक है। ताडयेत् का मूल अर्थ है, कठोर मार्गदर्शन, स्पष्ट सीमाएं, और परिणामों से साक्षात्कार।
यह वह समय है जब बालक सामाजिक नियमों, नैतिक मूल्यों और कार्य-कारण के संबंध को समझने में सक्षम होता है। चाणक्य जानते थे कि जो माता-पिता इस अवस्था में भी केवल लाड़ करते रहते हैं, वे वास्तव में अपने पुत्र से प्रेम नहीं करते, अपितु वे स्वयं की भावनात्मक सुविधा को प्राथमिकता देते हैं।
सांच कहै तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना। जब आप सच बोलते हैं, तो लोग आपको मारने (विरोध करने) दौड़ते हैं, लेकिन झूठ पर दुनिया विश्वास कर लेती है। तो क्या बिगाड़ के डर से सच नहीं कहेंगे? छह से पंद्रह वर्ष की आयु ही है जब बच्चे को सत्य की शक्ति बताना, उसकी सीमा समझाना और गलती पर तन कर खड़े होना, सिखाया जाता है।
और, सिखाने की यह प्रक्रिया और कुछ नहीं, बस सच्चे प्रेम का ही रूप है। यह अवस्था व्यक्ति को समाज के लिए तैयार करती है। विद्यालय, मित्र-मंडली, प्रतियोगिता, असफलता, ये सब उसे लोकव्यवहार सिखाते हैं। माता-पिता का काम है कि वे इस प्रक्रिया में मार्गदर्शक तो बने रहें, परंतु बाधक कतई नहीं।
सोलहवां वर्ष वह सन्धि-रेखा है जहां चाणक्य का असली दर्शन प्रकट होता है। मित्रत्वमाचरेत्, अर्थात मित्र की तरह व्यवहार करो। यह आदेश देना सबसे आसान है, पर करना सबसे कठिन। क्योंकि यहां माता-पिता को एक बड़ा आंतरिक संघर्ष जीतना पड़ता है। नियंत्रण छोड़ने का संघर्ष।
जो माता-पिता पंद्रह वर्ष तक अधिकारी रहे हैं, उन्हें अचानक सहयात्री बनना है। यह भूमिका-परिवर्तन उनसे मांगता है कि वे अपने पुत्र के निर्णयों को सुनें, उनकी राय का सम्मान करें, और उन्हें गलतियां करने का अधिकार दें। मित्रता का अर्थ है समान धरातल। और समान धरातल तभी संभव है जब एक पक्ष अपनी श्रेष्ठता का दंभ छोड़े।
चाणक्य का यह श्लोक जब हम व्यापक दृष्टि से देखते हैं, तो यह राज्य-शासन का भी सिद्धांत बन जाता है। कोई भी संस्था, वह चाहे परिवार हो, राज्य हो, या संगठन, पहले पोषण करती है, फिर अनुशासन स्थापित करती है, और अंततः स्वायत्तता देती है। जो व्यवस्था इस क्रम को उलट दे, जो जन्म से ही दंड दे, या जो कभी स्वतंत्रता न दे, वह व्यक्ति नहीं, बंधुआ उत्पन्न करती है।
भारतीय परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध भी इसी क्रम से चलता था। प्रारंभ में आश्रय, मध्य में कठोर साधना, और अंत में जब शिष्य पक जाता, तब गुरु उसे सखा कहकर पुकारते थे। कृष्ण ने अर्जुन को सखे कहा। यह संबोधन एक पूरी यात्रा का फल था।
आज हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां दो विपरीत अतियां एक साथ चल रही हैं। एक ओर हेलिकॉप्टर पैरेंटिंग है, जो पंद्रह वर्ष बाद भी बच्चे को छोड़ती नहीं; दूसरी ओर अबस्टे पैरेंटिंग है, जो पांच वर्ष में ही बच्चे को स्क्रीन के हवाले कर देती है। चाणक्य का यह श्लोक दोनों अतियों का उत्तर है। न अति-संरक्षण, न अति-स्वतंत्रता, अपितु समयोचित परिवर्तन। पालन का सबसे बड़ा लक्ष्य यही है कि एक दिन आपकी आवश्यकता न रहे और उस दिन आप गर्व से मित्र बन सकें।
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