
भावार्थ : जब तक यह शरीर स्वस्थ है और मृत्यु दूर है, तब तक अपने आत्मा के कल्याण के लिए सत्कर्म कर लेने चाहिए, क्योंकि मृत्यु निकट आने या प्राण छूटने के बाद क्या किया जा सकता है?
चाणक्य का यह श्लोक एक ऐसे सत्य को स्पर्श करता है जिसे मनुष्य जानता तो सदा से है, पर मानता कभी-कभी ही है। अर्थ सीधा है कि जब तक यह देह स्वस्थ है, जब तक मृत्यु दूर है, तब तक अपना हित करो। प्राण जाने के क्षण में क्या कर सकोगे?
किंतु इस सीधे अर्थ के भीतर एक गहरी दार्शनिक चेतावनी छिपी है जो केवल व्यक्ति को नहीं, समाज को भी संबोधित करती है। आत्महित केवल स्वार्थ नहीं है। चाणक्य के संदर्भ में 'आत्महित' का अर्थ है आत्मा का, अपने समग्र अस्तित्व का हित। शरीर का, बुद्धि का, चरित्र का, और उस व्यापक जीवन-लक्ष्य का हित जिसके लिए यह मनुष्य-देह मिली है।
भारतीय दर्शन में देह को सदा अनित्य कहा गया है। शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्। किंतु यहां चाणक्य एक व्यावहारिक कोण से बात करते हैं। वे कहते हैं कि अनित्यता का ज्ञान यदि कर्म से विरत करे, तो वह ज्ञान नहीं, पलायन है। स्वस्थ देह एक अवसर है, एक खुली खिड़की है जो किसी भी क्षण बंद हो सकती है।
मृत्यु का स्मरण भारतीय परंपरा में भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि कर्म को तीव्र करने के लिए किया जाता रहा है। जो व्यक्ति जानता है कि यह क्षण अंतिम भी हो सकता है, वह प्रत्येक क्षण को सम्पूर्णता से जीता है। चाणक्य की इस पंक्ति में वही उर्जा है। प्राणान्ते किं करिष्यति अर्थात मृत्यु की देहरी पर खड़े होकर क्या कर सकोगे? तब तो हाथ खाली होंगे, बुद्धि शिथिल होगी, और अवसर जा चुका होगा।
यह श्लोक वस्तुतः उस मानसिकता पर सीधा प्रहार है जिसे आज हम बहानेबाजी कहते हैं। कल करेंगे, जब समय आएगा तब देखेंगे, अभी तो बहुत जीवन पड़ा है। यह केवल आलस्य नहीं है; यह एक दार्शनिक भ्रम है। यह भ्रम कि समय असीमित है।
समाज में हम देखते हैं कि मनुष्य जीवन के सबसे उर्वर वर्ष इसी प्रतीक्षा में बिता देता है। युवावस्था में सोचता है कि वृद्ध होने पर तीर्थ करेंगे। स्वस्थ रहते सोचता है कि बीमार पड़ेंगे तब परिवार को समय देंगे। सम्पन्न होने पर सोचता है कि और कमा लें, फिर दान करेंगे। चाणक्य इसी मनोवैज्ञानिक स्थगन को तोड़ते हैं। वे कहते हैं कि यह 'बाद' कभी नहीं आता। जो करना है, अभी करो।
इस श्लोक की व्याख्या केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित रखना इसके साथ अन्याय होगा। चाणक्य एक राजनीतिशास्त्री और समाजचिंतक थे। उनका 'आत्महित' कहीं न कहीं समाज के हित से जुड़ा है। जो नागरिक अपने दायित्व को कल पर टालता है, चाहे वह मतदान हो, शिक्षा हो, या सामाजिक भागीदारी।
वह उस समाज को कमजोर करता है जिसमें वह स्वयं जीता है। जो नेता अपने क्षेत्र के विकास को चुनाव तक स्थगित रखता है, जो संस्था अपने सुधारों को 'उचित समय' की प्रतीक्षा में रोके रखती है, वे सब इसी श्लोक के विपरीत आचरण कर रहे हैं। स्वस्थ समाज वही है जो अपनी समस्याओं को वर्तमान में देखता है, वर्तमान में सुलझाने का प्रयास करता है। राष्ट्र की देह भी तभी तक सुधार योग्य है जब तक उसमें जीवन-शक्ति है।
रोचक यह है कि आज की mindfulness और present-moment awareness की जो वैश्विक चर्चा है, चाणक्य उसके निकट खड़े दिखते हैं, किंतु एक महत्वपूर्ण अंतर के साथ। पश्चिमी माइंडफुलनेस प्रायः अनुभव पर केंद्रित है कि इस क्षण को महसूस करो। चाणक्य का वर्तमान-बोध कर्म-केंद्रित है कि इस क्षण में कुछ करो, कुछ बनो, कुछ दो। यह भेद महत्वपूर्ण है। चाणक्य की परंपरा में जीवन केवल अनुभव नहीं, साधना है और साधना के लिए स्वस्थ देह, सजग मन और उपलब्ध समय, इन तीनों का संयोग चाहिए।
यह श्लोक एक दर्पण है। इसमें झांकने पर मनुष्य को अपना वह चेहरा दिखता है जो स्थगन और आत्म-वंचना में जी रहा है। चाणक्य कोई उपदेशक की मुद्रा में नहीं, एक कुशल वैद्य की भांति निदान करते हैं। देह अभी ठीक है, मृत्यु अभी दूर है, अर्थात यह क्षण अमूल्य है। इसे व्यर्थ मत जाने दो। जो व्यक्ति इस श्लोक को केवल पढ़ता है वह विद्वान है। जो इसे जीता है, वही चाणक्य का सच्चा शिष्य है।
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