
भावार्थ : अकेले में तप, दो से पढ़ना, तीन से गाना, चार से पन्थ में चलना, पांच से खेती और बहुतों से युद्ध भलीभांति संपन्न होते हैं।
कल्पना करें कि एक पुरुष अरण्य में एकांत साधना में बैठा है। उसके पास कोई नहीं। और यही उचित है। अब कल्पना करें कि पांच लोग एक साथ तप करने बैठे हैं। स्वाभाविक ही पांच मन, पांच विचार, पांच अहंकार। वह साधना नहीं, सम्मेलन बन जाएगा। आचार्य चाणक्य का यही सूत्र है। उन्होंने जीवन के प्रत्येक कार्य के लिए एक उचित संख्या निर्धारित की और उसे एक ही श्लोक में बांध दिया।
श्लोक का प्रथम सूत्र है, 'एकाकिना अन्तः तपः' अर्थात तप एकाकी ही होता है। तप का तात्पर्य केवल कठोर अनुष्ठान नहीं है। यह अन्तर्मुखता की वह दशा है जिसमें मनुष्य अपने भीतर के कोलाहल को शांत करके स्वयं से साक्षात्कार करता है। जब दो व्यक्ति एक साथ होते हैं, तब भी एक सूक्ष्म प्रदर्शन प्रारम्भ हो जाता है। दूसरे की उपस्थिति मात्र से अहंकार जागृत होता है। उपनिषद कहते हैं 'एकमेवाद्वितीयम्' अर्थात परम सत्य एक और अद्वितीय है। उसी प्रकार तप भी एकांत में ही फलता है। जो मनुष्य भीड़ में तपस्वी बनना चाहता है, वह वास्तव में अपनी प्रशंसा का तपस्वी होता है।
चाणक्य का दूसरा सूत्र है कि पठन दो व्यक्तियों के साथ उत्तम होता है। एकल अध्ययन में भटकाव का भय रहता है। अपनी समझ की सीमा दिखती नहीं। किन्तु जब दूसरा व्यक्ति साथ हो, तो प्रश्न और उत्तर का एक सजीव प्रवाह बनता है। गुरु-शिष्य की परम्परा भी इसी सिद्धान्त पर टिकी है। दो से अधिक होने पर विद्या का स्थान विवाद ले लेता है। तीन या चार व्यक्तियों का समूह शीघ्र ही वाद-विवाद का अखाड़ा बन जाता है जहां 'समझना' नहीं, 'जीतना' प्रमुख हो जाता है। गुरुकुल में भी एकान्तिक शिक्षण का आदर्श इसीलिए था।
'गायनं त्रिभिः' यह सूत्र केवल संगीत की बात नहीं करता, यह सामूहिक सृजन के न्यूनतम स्वरूप की बात करता है। दो व्यक्तियों में प्रतिस्पर्धा की सम्भावना अधिक रहती है। तीन में एक प्रकार का साम्य आता है। भारतीय संगीत-परम्परा में स्वर, ताल और भाव की त्रिपुटी इसका प्रमाण है। तीन की उपस्थिति में सहयोग स्वाभाविक रूप से जन्म लेता है क्योंकि कोई एक पक्ष प्रभावी नहीं होता, सन्तुलन बना रहता है। यह केवल संगीत पर नहीं, किसी भी सृजनात्मक सहयोग पर लागू होता है।
'चतुर्भिः गमनं क्षेत्रम्' अर्थात क्षेत्र-भ्रमण के लिए चार उत्तम हैं। इसमें व्यावहारिक बुद्धि स्पष्ट है। दो हों तो एक के अस्वस्थ होने पर दूसरा असहाय होता है। तीन में निर्णय कभी-कभी दो बनाम एक में बंट जाता है। चार में एक स्वाभाविक संतुलन होता है, सुरक्षा होती है, और निर्णय-क्षमता भी। यह सूत्र आधुनिक प्रबन्धन के 'core team' की अवधारणा से आश्चर्यजनक रूप से मेल खाता है। किसी भी परियोजना का न्यूनतम सक्षम दल प्रायः चार व्यक्तियों का ही होता है।
'पंचभिः बहुभिः रणम्' अर्थात युद्ध अथवा संघर्ष में पांच या अधिक की आवश्यकता होती है। यह केवल शारीरिक युद्ध की बात नहीं। जीवन का प्रत्येक संघर्ष, चाहे वह न्यायालय में हो, राजनीति में हो, या सामाजिक परिवर्तन में, बहुमत की शक्ति मांगता है। चाणक्य स्वयं इसके प्रमाण थे। उन्होंने चन्द्रगुप्त को एकाकी नहीं, एक सशक्त समूह के साथ खड़ा किया। अकेला व्यक्ति अपनी शक्ति में श्रेष्ठ हो सकता है, किन्तु सामूहिक प्रतिरोध के सम्मुख वह असमर्थ रहता है।
यह श्लोक वस्तुतः 'सामाजिक बुद्धिमत्ता' का प्राचीनतम मानचित्र है। आज का मनुष्य अपने एकान्त में सोशल मीडिया ले जाता है और अपनी साधना नष्ट करता है। समूह में अध्ययन करने की आड़ में प्रायः मनोरंजन होता है। चाणक्य का यह सूत्र एक सरल प्रश्न पूछता है कि क्या तुम जानते हो कि किस कार्य के लिए कितने लोग चाहिए? क्योंकि जो यह नहीं जानता, वह न तप कर पाता है, न ठीक से पढ़ पाता है, न यात्रा सफल होती है और न युद्ध जीता जाता है। संख्या गिनना सांसारिक कार्य लगता है। किन्तु चाणक्य का यह श्लोक बताता है कि संख्या की सूझ ही जीवन की सफलता का गणित है।
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