
भावार्थ : कन्या का विवाह उत्तम कुल में करो, पुत्र को विद्या दो, शत्रु को व्यसन में फंसाओ और मित्र को धर्म के मार्ग पर लगाओ।
चाणक्य यहां 'सुकुल' से तात्पर्य केवल धनी या उच्च जाति के परिवार से नहीं लगाते। सुकुल का अर्थ है- सदाचारी, संस्कारी और नैतिक मूल्यों वाला परिवार। उनकी दृष्टि में कन्या का जीवन उस कुल की परिस्थितियों से गहराई से प्रभावित होता है जिसमें वह जाती है। दार्शनिक दृष्टि से यह विचार पर्यावरणवाद का समर्थन करता है। अर्थात व्यक्ति का निर्माण उसके परिवेश से होता है। यदि परिवेश श्रेष्ठ है तो व्यक्तित्व श्रेष्ठ बनेगा।
सामाजिक दृष्टि से यह संदेश आज भी प्रासंगिक है। विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, दो संस्कृतियों और मूल्य-प्रणालियों का मिलन है। आधुनिक समाज में इस सूत्र की व्याख्या यह हो सकती है कि कन्या को ऐसे जीवन-साथी और परिवेश में स्थापित किया जाए जहां उसका व्यक्तित्व, स्वतंत्रता और गरिमा सुरक्षित रहे।
चाणक्य का यह कथन उनके सुप्रसिद्ध सिद्धांत का विस्तार है, 'माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः'। चाणक्य कह चुके हैं कि वह माता शत्रु है और पिता वैरी, जिसने बच्चे को नहीं पढ़ाया। यहां 'विद्या' का अर्थ केवल अक्षर-ज्ञान नहीं है। चाणक्य के अर्थशास्त्र में विद्या के चार अंग हैं- आन्वीक्षिकी (तर्कशास्त्र/दर्शन), त्रयी (धर्म-वेद), वार्ता (अर्थशास्त्र/जीविका) और दण्डनीति (राजनीति)। अर्थात विद्या वह समग्र ज्ञान है जो मनुष्य को स्वावलंबी, विवेकशील और समाज के प्रति उत्तरदायी बनाए।
दार्शनिक स्तर पर यह विचार इस सत्य को रेखांकित करता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी ज्ञान है, न धन, न भूमि। संपत्ति नष्ट हो सकती है, किंतु विद्या कभी नहीं छिनती। सामाजिक दृष्टि से यह सूत्र पीढ़ी-दर-पीढ़ी उत्थान का मार्ग प्रशस्त करता है।
यह श्लोक का सर्वाधिक कूटनीतिक और विवादास्पद भाग है। चाणक्य यहां कहते हैं कि शत्रु को प्रत्यक्ष युद्ध से नष्ट करने की आवश्यकता नहीं। यदि वह स्वयं जुआ, मद्य, विलासिता, अहंकार जैसे व्यसनों में डूब जाए, तो स्वयं अपना विनाश कर लेता है। यह सामरिक मनोविज्ञान का सिद्धांत है। आधुनिक भू-राजनीति में इसे 'Soft Power Subversion' अर्थात शत्रु राष्ट्र की आंतरिक दुर्बलताओं का दोहन करना कहा जाता है।
परंतु शत्रु केवल बाहरी व्यक्ति नहीं, भीतर के दुर्गुण भी हैं। क्रोध, लोभ, आलस्य ये व्यसन हैं। जो इनमें फंसा, वह अपना ही शत्रु बन गया। चाणक्य यह भी संकेत करते हैं कि राज्य और समाज की सुरक्षा के लिए शत्रु की शक्ति को छल-बल से क्षीण करना नीति-सम्मत है।
इष्ट अर्थात प्रिय, मित्र, स्वजन, शुभचिंतक। चाणक्य कहते हैं कि प्रियजन के प्रति सबसे बड़ा उपकार यह है कि उसे धर्म के मार्ग पर स्थापित किया जाए। यहां धर्म का अर्थ धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि कर्तव्य, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व है। सच्चा मित्र वही है जो मित्र को भोग-विलास में नहीं, सत्कर्म में प्रवृत्त करे। यह सूत्र एक गहरी सामाजिक सच्चाई को उजागर करता है कि संबंधों की सार्थकता तभी है जब वे एक-दूसरे को नैतिक उत्थान की ओर ले जाएं।
यह एक श्लोक चाणक्य की समग्र जीवन-दृष्टि का संक्षेप है। वे मानते हैं कि जीवन में सफलता के लिए संबंध-प्रबंधन सबसे महत्त्वपूर्ण कला है। कन्या के लिए श्रेष्ठ परिवेश, पुत्र के लिए ज्ञान, शत्रु के लिए नीति और मित्र के लिए नैतिक मार्गदर्शन, यही चाणक्य का चतुर्मुखी जीवन-सूत्र है। आज भी यह श्लोक उतना ही प्रासंगिक है क्योंकि मानव-स्वभाव, संबंध और समाज की मूलभूत संरचना सदियों बाद भी नहीं बदली।
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