आज का सुविचार: किसको दें, किसे नहीं? चाणक्य ने निर्णय लेने का दे दिया सूत्र

Quote of the day: प्रकृति का यह नियम अटल है कि जल बिना पात्र देखे नहीं बरसता। मेघ उसी भूमि पर वर्षा करता है जो उसे सोख सके, धारण कर सके, और जीवन उत्पन्न कर सके। चाणक्य यही कहते हैं कि मनुष्य को प्रकृति का यह विवेक सीखना चाहिए।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड16 Jun 2026, 09:29 AM IST
चाणक्य नीति से आज का सुविचार।
चाणक्य नीति से आज का सुविचार।

चाणक्य नीति श्लोक

वित्तं देहि गुणान्वितेषु मतिमन्नान्यत्र देहि क्वचित्प्राप्तं

वारिनिधेर्जलं घनमुखे माधुर्ययुक्तं सदा।

जीवान्स्थावरजंगमांश्च सकलान्संजीव्य भूमण्डलं

भूयः पश्य तदेव कोटिगुणितं गच्छन्तमम्भोनिधिम् ॥

भावार्थ: हे मतिमन्, गुणियों को धन दो औरों को नहीं। समुद्र से वाष्पित होकर जल मेघ बनकर सदा मधुर हो जाता है। फिर वर्षा बनकर पृथ्वी पर चर-अचर सब जीवों को जीवन देता है और वही जल कोटि गुणा होकर पुनः समुद्र में लौट आता है।

वर्षा का रूपक, जीवन का सत्य

आकाश में बादल उठते हैं। समुद्र का जल वाष्प बनकर ऊपर जाता है, बादल में ढलता है, और फिर मेघ के रूप में धरती पर लौटता है। यह जल न केवल मनुष्यों की प्यास बुझाता है, बल्कि वृक्षों को, पशु-पक्षियों को, कीट-पतंगों को, और स्थावर-जंगम सभी प्राणियों को जीवन देता है। और तब वही जल नदियों, झरनों तथा भूगर्भ के माध्यम से पुनः समुद्र में लौट आता है, किंतु अब कोटि-गुणित होकर। चाणक्य इसी प्रकृति के चक्र में अपनी महानीति का सूत्र खोजते हैं।

श्लोक का भावार्थ सीधा और शक्तिशाली है: हे बुद्धिमान! अपना धन गुणी व्यक्तियों को दो, अन्यत्र कहीं नहीं। ठीक उसी प्रकार जैसे समुद्र का जल बादल द्वारा ग्रहण किया जाता है और मधुर होकर बरसता है, संपूर्ण पृथ्वी के स्थावर और जंगम प्राणियों को जीवन देता है, और फिर करोड़ों गुना होकर उसी समुद्र में लौट आता है।

चाणक्य का अर्थशास्त्र और दान का संकट

चाणक्य ने यह नीति उस युग में लिखी जब पाटलिपुत्र की राजसत्ता असंगठित थी और मगध का साम्राज्य टूटने की कगार पर था। उस काल में जो राजा या धनी व्यक्ति अपना धन अपात्रों पर, मनोरंजन पर, या निरर्थक आयोजनों पर व्यय करता था, वह समाज को नहीं, केवल अपनी क्षणिक प्रतिष्ठा को पोषित करता था। चाणक्य ने देखा कि वास्तविक समृद्धि वहीं से आती है जहां संसाधन गुणी, कर्मठ और योग्य हाथों में जाते हैं। यहां 'गुणान्वित' शब्द केवल विद्वान या पंडित का बोध नहीं कराता। गुणी वह है जो अर्जित संसाधन को गुणित करने की क्षमता रखता हो, जो समाज को प्रतिदान दे सके, जो ज्ञान, कौशल, श्रम, या नेतृत्व से किसी न किसी रूप में मानव-समाज को आगे ले जाता हो।

प्रश्न यह नहीं कि हम देते हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि हम किसे देते हैं, और क्यों। जो देना गुण को पोषित करे, वही देना कोटि-गुणित होकर लौटता है। शेष सब व्यय है, निवेश नहीं।

जल का दार्शनिक रूपक और पुनर्प्रवाह का सिद्धांत

इस श्लोक की दार्शनिक गहराई उसके रूपक में है। चाणक्य केवल 'दो और प्रतिफल पाओ' जैसा व्यापारिक सूत्र नहीं दे रहे। वे एक प्राकृतिक चक्र की ओर संकेत कर रहे हैं जो स्वयंभू और अनिवार्य है। समुद्र के जल का वाष्पीकरण एक प्रकार का त्याग है। वह जल बादल बनता है तो मधुर हो जाता है, अर्थात अपनी लवणता खो देता है। इसका तात्पर्य है कि जब संपत्ति समाज-हित के लिए दी जाती है तो उसका स्वभाव बदलता है, वह परिष्कृत होती है।

फिर वह जल धरती की प्रत्येक जीवित सत्ता को, बिना भेदभाव के, जीवन देता है। और अंत में वही जल कोटि-गुणित होकर लौटता है। यह पुनर्प्रवाह का सिद्धांत भारतीय दर्शन का मूल तत्त्व है। भगवद्गीता में कृष्ण ने कहा है कि जो कर्म फल की आकांक्षा से रहित होकर किया जाए, वही सात्त्विक है। चाणक्य उसी को नीति-भाषा में कहते हैं कि देने का उद्देश्य लौटाने का नहीं, उगाने का होना चाहिए।

समाज को गुणियों में निवेश की आवश्यकता

यह श्लोक आज की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था पर एक तीखा प्रश्न उठाता है। हम प्रायः देखते हैं कि संसाधन उन स्थानों पर प्रवाहित होते हैं जहां जनसंख्या है, शोर है, या राजनीतिक दबाव है। चाणक्य की नीति कहती है कि यह अंततः हानिकारक है। बीज उस भूमि में बोया जाए जो उपजाऊ हो। यह प्रश्न संस्थानों और सरकारों के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना व्यक्तियों के लिए।

आधुनिक व्यापार-जगत में वॉरेन बफेट का वह प्रसिद्ध सिद्धांत इसी नीति की प्रतिध्वनि है जिसमें उन्होंने कहा था, 'पूंजी वहां लगाओ जहां उसके मूल्य में वृद्धि सुनिश्चित हो।' किंतु चाणक्य इससे एक कदम आगे जाते हैं। वे केवल लाभ की बात नहीं करते, वे पूरे भूमण्डल के जीवन की बात करते हैं।

आज के कार्यस्थल और उद्यमिता में यह नीति

हमारे पाठक जो व्यापार और अर्थ-जगत से जुड़े हैं, उनके लिए यह श्लोक एक स्पष्ट संदेश रखता है कि प्रतिभा में निवेश करो। जो उद्यमी या प्रबंधक अपने सर्वश्रेष्ठ कर्मचारियों के विकास में संसाधन लगाता है, वह समुद्र की भांति है जो वाष्प देता है और वर्षा पाता है। जो अपात्रों की चापलूसी पर, अनुत्पादक बैठकों पर, या भ्रामक विपणन पर व्यय करता है, वह उस नदी के समान है जो रेत में खो जाती है। शिक्षा-जगत में भी यही सत्य लागू है। जो राष्ट्र अपने प्रतिभाशाली विद्यार्थियों पर शोध-संसाधन लगाता है, वह अंततः ज्ञान-शक्ति से सम्पन्न होता है। जो केवल संख्या बढ़ाता है, वह भीड़ तैयार करता है।

बादल कभी व्यर्थ नहीं बरसता

प्रकृति का यह नियम अटल है कि जल बिना पात्र देखे नहीं बरसता। मेघ उसी भूमि पर वर्षा करता है जो उसे सोख सके, धारण कर सके, और जीवन उत्पन्न कर सके। चाणक्य यही कहते हैं कि मनुष्य को प्रकृति का यह विवेक सीखना चाहिए। प्रश्न यह नहीं कि हम देते हैं या नहीं। प्रश्न यह है कि हम किसे देते हैं, और क्यों। जो देना गुण को पोषित करे, वही देना कोटि-गुणित होकर लौटता है। शेष सब व्यय है, निवेश नहीं।

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