
भावार्थ : आयु, कर्म, वित्त, विद्या और मृत्यु, ये पांच तत्व उस क्षण ही निर्धारित हो जाते हैं जब आत्मा गर्भ में प्रवेश करती है।
चाणक्य नीति का यह श्लोक उस परम सत्य को उद्घाटित करता है जो मनुष्य की सबसे गहरी जिज्ञासा का उत्तर है। मैं क्यों हूं, कैसे हूं, और कब तक हूँ? चाणक्य कहते हैं कि आयु, कर्म, वित्त, विद्या और मृत्यु, ये पांच तत्व उस क्षण ही निर्धारित हो जाते हैं जब आत्मा गर्भ में प्रवेश करती है। यानी जन्म से पहले ही एक रेखाचित्र खिंच जाता है। यह दैव-निर्धारण का सिद्धांत है, किंतु चाणक्य इसे किसी निराशावादी भाग्यवाद के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
यहां एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि सब कुछ पूर्वनिर्धारित है, तो फिर कर्म की क्या सार्थकता? लेकिन ध्यान से देखें तो चाणक्य ने स्वयं 'कर्म' को उन पांच तत्वों में सम्मिलित किया है। वे यह नहीं कहते कि केवल फल पूर्वनिर्धारित है; वे कहते हैं कि कर्म का स्वभाव, उसकी दिशा और उसकी प्रकृति भी उस आत्मा के संस्कारों में पहले से अंकित होती है। यह भारतीय दर्शन की वह सूक्ष्म दृष्टि है जो नियति और पुरुषार्थ को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक मानती है। गीता भी यही कहती है, 'न कर्तृत्वं न कर्माणि', अर्थात कर्ता का अहंकार मिथ्या है, पर कर्म की अनिवार्यता सत्य है।
चाणक्य ने वित्त और विद्या को एक ही पंक्ति में रखा। यह संयोग नहीं है। ये दोनों मनुष्य के बाह्य और आंतरिक सामर्थ्य के प्रतीक हैं। वित्त वह है जो संसार में स्थान दिलाता है; विद्या वह है जो उस स्थान को अर्थ देती है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह श्लोक एक गहरे यथार्थ को स्वीकार करता है कि हर मनुष्य एक विशेष आर्थिक और बौद्धिक परिवेश में जन्मता है।
आज की भाषा में कहें तो जन्म के साथ ही सामाजिक पूंजी, सांस्कृतिक विरासत और आर्थिक संभावनाएं एक हद तक तय हो जाती हैं। किंतु चाणक्य यहां रुकते नहीं। उनकी समग्र नीति इस बात का प्रमाण है कि विद्या वह एकमात्र तत्व है जो नियति की रेखाओं को पुनः लिखने की क्षमता रखती है। इसीलिए उन्होंने शिक्षा को सर्वोच्च निवेश माना।
चाणक्य ने 'निधन' को अंत में रखा। यह क्रम महत्त्वपूर्ण है। मृत्यु केवल एक घटना नहीं, वह जीवन का संदर्भ है। जिस क्षण हम जानते हैं कि यह यात्रा समाप्त होगी, उसी क्षण आयु का मूल्य, कर्म की तात्कालिकता, वित्त की सीमा और विद्या की अनंतता, सब स्पष्ट हो जाती है। उपनिषदों में यमराज ने नचिकेता को ठीक यही पाठ पढ़ाया था। मृत्यु का बोध ही सबसे बड़ा जागरण है। चाणक्य का यह श्लोक इस अर्थ में एक मृत्यु-दर्शन भी है कि जो जानता है कि उसका समय सीमित है, वही अपनी आयु, कर्म, वित्त और विद्या का सदुपयोग करता है।
आज के युग में जब मनुष्य अपनी पहचान को केवल उपलब्धियों से मापता है, यह श्लोक एक आवश्यक विराम है। यह हमें याद दिलाता है कि हम सब एक बड़े प्रवाह के हिस्से हैं, जहां नियंत्रण का अहंकार व्यर्थ है और विनम्रता ही ज्ञान है। साथ ही, यह निष्क्रियता का निमंत्रण नहीं है। चाणक्य सदैव कर्मशील, जागरूक और विद्यावान मनुष्य की वकालत करते हैं।
पूर्वनिर्धारण की स्वीकृति और सक्रिय जीवन का समन्वय, यही इस श्लोक का वह अर्थ है जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना चाणक्य के काल में था। यह श्लोक अंततः एक दर्पण है, जिसमें झांककर मनुष्य अपनी सीमाएं और संभावनाएं, दोनों एक साथ देख सकता है।
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