
भावार्थ : संतान, जीवनसाथी और सज्जनों की संगति, ये तीन संसार के ताप से जलते हुए मनुष्यों को शीतलता देते हैं।
चाणक्य कहते हैं, संसारतापदग्धानाम्। अर्थात जो इस संसार की तपन से झुलसे हुए हैं, उनके लिए विश्राम के तीन आधार हैं: संतान, पत्नी (जीवनसाथी), और सज्जनों की संगति। यह श्लोक केवल एक सामाजिक सूत्र नहीं, बल्कि मानव-चेतना की एक गहरी पहचान है। इसे समझने के लिए पहले उस 'ताप' को समझना होगा जिसकी बात चाणक्य कर रहे हैं।
संसारताप कोई एक व्याधि नहीं है। यह अस्तित्व की उस निरंतर बेचैनी का नाम है जो मनुष्य को तब घेरती है जब वह जानता है कि सब कुछ अनित्य है, फिर भी वह किसी-न-किसी चीज से जुड़ने के लिए विवश है।
महत्त्वाकांक्षा का बोझ, संबंधों की जटिलता, आर्थिक संघर्ष, मृत्यु का भय, अपमान की स्मृति, ये सब मिलकर एक ऐसी अग्नि बनाते हैं जिसमें मनुष्य प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा जलता है। चाणक्य का मनोविज्ञान इस ताप को स्वीकार करके चलता है। वे यह नहीं कहते कि संसार छोड़ दो, या वैराग्य धारण कर लो। वे कहते हैं कि इस ताप के बीच तीन चीजें हैं जो तुम्हें जीने की शक्ति देती हैं।
संतान केवल वंश-विस्तार का माध्यम नहीं है। वह उस निरंतरता का बोध है जो मनुष्य को अपनी नश्वरता के भीतर भी अमरत्व का अनुभव कराती है। जब कोई पिता अपने शिशु की हंसी देखता है, तो उस क्षण उसके सारे तनाव एक विराम पाते हैं। यह विराम ही 'विश्रांति' है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से संतान मनुष्य को भविष्य से जोड़ती है। जब वर्तमान दुखदायी हो, तो संतान का अस्तित्व एक ऐसे 'प्रयोजन' का बोध देता है जो व्यक्ति को टूटने से बचाता है। चाणक्य ने इसे पहले स्थान पर रखा। शायद इसलिए कि यह जीवन-संकल्प का सबसे प्राकृतिक और तात्कालिक स्रोत है।
कलत्र का अर्थ केवल विवाहित साथी नहीं, इसमें वह सम्पूर्ण गृहस्थ-सत्ता निहित है जो एक व्यक्ति के जीवन को संरचना देती है। चाणक्य स्वयं एक कठोर नीतिशास्त्री थे, किंतु वे यह जानते थे कि बिना प्रेमपूर्ण गृहसंसार के व्यक्ति की आत्मिक ऊर्जा बिखर जाती है। जहां संतान भविष्य का बोध देती है, वहां जीवनसाथी वर्तमान का आश्रय बनता है।
कठिन दिनों में लौटने के लिए एक घर चाहिए। और वह घर ईंट-पत्थर से नहीं, एक विश्वासपात्र उपस्थिति से बनता है। सामाजिक दृष्टि से भी यह महत्त्वपूर्ण है। स्वस्थ दाम्पत्य संबंध एक ऐसी सामाजिक इकाई निर्मित करते हैं जो व्यक्ति और समाज दोनों को स्थिरता प्रदान करती है।
यहां चाणक्य एक छलांग लगाते हैं। संतान और जीवनसाथी, दोनों व्यक्तिगत संसार के भीतर की शरण हैं। किंतु 'सतां संगति' अर्थात सज्जनों की संगति एक भिन्न आयाम की विश्रांति है। यह वह संगति है जहां व्यक्ति को अपना श्रेष्ठतम रूप याद दिलाया जाता है। जहां बातचीत सत्य की ओर मुड़ती है, जहां स्पर्धा नहीं, साधना है। सज्जन वे हैं जो न तुम्हारी चाटुकारिता करते हैं, न तुम्हें कुचलते हैं, अपितु वे तुम्हारे भीतर के उस व्यक्ति को जगाए रखते हैं जो संसारताप में धीरे-धीरे सो जाता है।
आज का मनुष्य एक विशेष प्रकार के संसारताप में जी रहा है जहां सूचना का अतिरेक है, संबंध सतही हैं, और सफलता की अंतहीन दौड़ लगी है। इस संदर्भ में चाणक्य का यह श्लोक और अधिक तीव्रता से बोलता है।
जो व्यक्ति न परिवार से जुड़ा है, न किसी सत्संगी मित्र से, वह कितनी भी भौतिक सफलता पाकर भी भीतर से रिक्त रहता है। चाणक्य का यह सूत्र वास्तव में एक मनोवैज्ञानिक अनुशासन है कि जीवन में इन तीनों को सचेत रूप से सींचो, क्योंकि यही तुम्हारी जीवनशक्ति के मूलाधार हैं।
चाणक्य के इस श्लोक की विशिष्टता यह है कि यह न तो संन्यास का आह्वान है, न केवल गृहस्थ-जीवन की प्रशंसा। यह एक सन्तुलित मानव-दृष्टि है। स्वीकार करो कि संसार में ताप है, और फिर सचेत होकर उन तीन स्रोतों को जीवन में बनाए रखो जो उस ताप में भी जीने की इच्छा को जीवित रखते हैं। यही चाणक्य की व्यावहारिक दर्शन-परंपरा की असली शक्ति है।
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