
भावार्थ: ईख, जल, दूध, मूल, पान, फल, और औषध इन वस्तुओं के भोजन करने पर भी स्नान दान आदि क्रिया करनी चाहिए।
आधुनिक कॉर्पोरेट जगत में प्रायः एक धारणा देखी जाती है कि भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति अथवा तात्कालिक शारीरिक सुखों के उपभोग के पश्चात मनुष्य अपने मूल कर्तव्यों से कुछ समय के लिए विमुख हो सकता है। किसी महत्वपूर्ण व्यावसायिक बैठक में अल्पाहार के उपरांत अथवा यात्रा के समय शिथिलता को स्वाभाविक मान लिया जाता है। किंतु आचार्य चाणक्य का नीतिशास्त्र इस शिथिलता को स्वीकार नहीं करता। मौर्य साम्राज्य के सूत्रधार कौटिल्य ने मानव जीवन को एक अखंड यज्ञ माना है, जहां प्रत्येक क्षण कर्तव्य-परायणता की वेदी पर समिधा के समान है। यह श्लोक इसी अटूट कर्तव्य-बोध और जीवन की निरंतरता को रेखांकित करता है, जहां शारीरिक क्रियाएं आत्मिक और सामाजिक दायित्वों के मार्ग में बाधक नहीं बनतीं।
इस श्लोक का सरल भावार्थ यह है कि ईख, जल, दूध, कंदमूल, पान, फल और औषधि का सेवन करने के उपरांत भी मनुष्य को अपने दैनिक आवश्यक धार्मिक और सामाजिक कृत्य, जैसे स्नान और दान आदि अवश्य करने चाहिए। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो मगध साम्राज्य की स्थापना के काल में मगध की जनता और शासक वर्ग के सम्मुख जैन, बौद्ध और सनातन परंपराओं के विभिन्न आचार-व्यवहार उपस्थित थे।
चाणक्य ने देखा कि कई बार लोग भोजन अथवा विशिष्ट वस्तुओं के उपभोग को एक बहाना बनाकर अपने नित्य के सामाजिक और नैतिक कर्तव्यों को टाल देते थे। कौटिल्य ने इस प्रवृत्ति पर प्रहार किया क्योंकि राज्य की स्थिरता नागरिकों की व्यक्तिगत अनुशासन-प्रियता पर टिकी होती है। प्राचीन काल में व्रत, उपवास और शुचिता के कड़े नियम थे, जहां अन्न ग्रहण करने के पश्चात कई प्रकार के अनुष्ठान वर्जित माने जाते थे। आचार्य ने इस रूढ़ि को तोड़ते हुए स्पष्ट किया कि प्रकृति प्रदत्त कतिपय सात्विक वस्तुओं और जीवन रक्षक तत्वों के सेवन से शरीर अशुद्ध नहीं होता, अतः कर्म का परित्याग अनुचित है।
दार्शनिक स्तर पर यह श्लोक मनुष्य की मानसिक जड़ता और प्रमाद के विरुद्ध एक सशक्त उद्घोष है। जब हम ईख, फल या जल जैसी प्राकृतिक वस्तुओं का सेवन करते हैं, तो हमारे भीतर एक प्रकार की तृप्ति और तत्पश्चात शिथिलता का उदय होता है। भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने भी इसी सत्य को प्रतिपादित करते हुए कहा है कि 'यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्' अर्थात यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म का कभी त्याग नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये मनीषियों को पवित्र करने वाले हैं।
चाणक्य इसी विचार को व्यावहारिक धरातल पर लाते हैं। पाश्चात्य दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे ने अपनी पुस्तक 'दस स्पोक जरथुस्त्रा' में 'इच्छाशक्ति' (विल टू पावर) की बात की है, जो मनुष्य को उसकी शारीरिक सीमाओं से ऊपर उठाती है। आचार्य चाणक्य की नीति भी मनुष्य को यही सिखाती है कि शरीर की तृप्ति को आत्मा की सुसुप्ति नहीं बनने देना चाहिए। शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति केवल रथ में तेल डालने के समान है, रथ को रोकने का कारण नहीं हो सकती।
आधुनिक व्यावसायिक परिदृश्य और संगठन प्रबंधन में इस नीति की प्रासंगिकता अत्यधिक गहरी है। आज के कॉर्पोरेट जगत में 'बर्नआउट' अथवा 'कार्य-जीवन संतुलन' के नाम पर कई बार उत्तरदायित्वों से पलायन की प्रवृत्ति दिखाई देती है। पीटर ड्रकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द इफेक्टिव एग्जीक्यूटिव' में लिखा है कि प्रभावशीलता कोई अंतर्निहित गुण नहीं है, बल्कि यह एक आदत है जिसे निरंतर अभ्यास से अर्जित किया जाता है।
यदि एक प्रबंधक किसी बड़ी उपलब्धि या लाभांश के अर्जन के बाद विश्राम की मुद्रा में आ जाता है, तो संगठन की गति अवरुद्ध हो जाती है। चाणक्य के अनुसार, जिस प्रकार फल या औषधि का सेवन करने के बाद भी स्नान-दान रूपी नित्य कर्म अपरिहार्य हैं, उसी प्रकार किसी व्यवसाय में तात्कालिक सफलता (लो-हैंगिंग फ्रूट्स) प्राप्त करने के बाद भी आधारभूत प्रक्रियाओं, गुणवत्ता नियंत्रण और कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) जैसे अनिवार्य कार्यों में शिथिलता नहीं आनी चाहिए।
संस्थागत नेतृत्व के संदर्भ में 'दान' का अर्थ केवल धन का वितरण नहीं, बल्कि समाज और अपनी टीम को ज्ञान, संसाधन और सुरक्षा का हस्तांतरण है। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के एक शोध के अनुसार, जो कंपनियां संकट के समय भी अपने मूल मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्वों पर टिकी रहती हैं, वे दीर्घकाल में अधिक संवहनीय साबित होती हैं। चाणक्य का यह श्लोक वर्तमान के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सीईओ) और नीति-निर्माताओं को सचेत करता है कि जब संगठन को प्रचुर लाभ हो रहा हो, तब भी उसे अपनी शुचिता और परोपकार की नीति को नहीं छोड़ना चाहिए।
आज का समाज उपभोक्तावादी संस्कृति के जाल में फंसा हुआ है, जहां प्रत्येक उपभोग के बाद मनुष्य अधिक आत्मकेंद्रित हो जाता है। हम सुख-सुविधाओं के अर्जन को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान बैठते हैं और उसके बाद समाज के प्रति अपने ऋण को भूल जाते हैं। आचार्य चाणक्य का यह सूत्र हमें विलासिता और कर्तव्य के बीच संतुलन साधने का मार्ग दिखाता है।
यदि हमने जीवन रक्षक औषधि या शक्तिवर्धक फल ग्रहण किए हैं, तो हमारी कार्यक्षमता दोगुनी होनी चाहिए, न कि हमें विश्राम के गर्त में चले जाना चाहिए। समकालीन वैश्विक परिदृश्य में, जहां प्रत्येक मनुष्य अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की पूर्ति में व्यस्त है, वहां कौटिल्य का यह प्रश्न अत्यंत तीखा और प्रासंगिक हो जाता है। क्या हम अपनी शारीरिक और भौतिक तृप्ति को अपने सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्यों से पलायन का माध्यम बना रहे हैं, अथवा इन संसाधनों का उपयोग करके समाज के कल्याणार्थ अधिक तत्परता से आगे बढ़ रहे हैं?
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