
भावार्थ : मूर्ख जातक चिरंजीवी भी हो, उससे श्रेष्ठ वह है जो उत्पन्न होते ही मर गया क्योंकि मरा थोड़े ही दुःख का कारण होता है। जड़ बुद्धि जब तक जीता है तब तक दुख देता रहता है।
चाणक्य की यह उक्ति पहली दृष्टि में निर्मम लगती है, किन्तु इसके भीतर एक गहरी वेदना और सामाजिक चिंता छिपी है। श्लोक का सीधा अर्थ है कि जो मूर्ख चिरकाल जीता है, उससे तो वह व्यक्ति उत्तम है जो जन्म लेते ही मर गया। क्योंकि मृत शिशु एक बार दुःख देता है और चला जाता है, परन्तु जीवनभर जड़ बुद्धि बना रहने वाला व्यक्ति जीवन के प्रत्येक क्षण परिवार को, समाज को और स्वयं को जलाता रहता है।
यहां 'मूर्ख' से तात्पर्य केवल अनपढ़ या अशिक्षित व्यक्ति से नहीं है। चाणक्य 'जड़' शब्द का प्रयोग करते हैं। अर्थात् वह जिसकी विवेकशक्ति शिथिल हो, जो अनुभव से कुछ न सीखे, जो बार-बार वही भूल करे, जिसमें आत्म-परीक्षण की क्षमता न हो।
भारतीय दर्शन में जीवन को कभी निरुद्देश्य नहीं माना गया। उपनिषदों से लेकर गीता तक, जीवन को एक साधना के रूप में देखा गया है। धर्म, ज्ञान, कर्म और मोक्ष की दिशा में की जाने वाली यात्रा। कठोपनिषद् कहता है कि श्रेय और प्रेय में से श्रेय का मार्ग चुनना ही मनुष्यता की कसौटी है।
चाणक्य इसी दर्शन की व्यावहारिक भूमि पर खड़े होकर प्रश्न करते हैं कि यदि जीवन में विवेक नहीं, तो जीवन का अर्थ क्या? मात्र श्वास लेना जीवन नहीं है। वृक्ष भी सांस लेता है, पशु भी जीता है। मनुष्य की विशिष्टता उसकी प्रज्ञा में है। जब वह प्रज्ञा सुप्त हो, जब विवेक का दीप बुझा हो, तो दीर्घायु एक वरदान नहीं, एक दण्ड बन जाती है, स्वयं के लिए भी और समाज के लिए भी।
चाणक्य एक राजनीतिशास्त्री थे। उनकी दृष्टि व्यक्ति से परे समाज और राष्ट्र तक फैली हुई थी। इस श्लोक में उनकी सामाजिक चिन्ता स्पष्ट झलकती है। एक मूर्ख व्यक्ति केवल स्वयं को नहीं डुबोता। वह अपने परिवार की संचित सम्पत्ति नष्ट करता है, सम्बन्धों में विष घोलता है, अपने वंश की प्रतिष्ठा खण्डित करता है। यदि वह किसी पद पर हो, कोई सेनापति, कोई मंत्री, कोई न्यायाधीश तो उसकी मूर्खता का दायरा और विशाल हो जाता है।
इतिहास साक्षी है कि अनेक साम्राज्यों का पतन केवल शत्रु की तलवार से नहीं, बल्कि सिंहासन पर बैठे मूर्ख उत्तराधिकारियों के कारण हुआ। चाणक्य अर्थशास्त्र में जो 'अमात्य' की योग्यता वर्णित करते हैं, वह इसी श्लोक का विस्तार है। विवेकशून्य व्यक्ति को कोई भी उत्तरदायित्व देना राष्ट्र के साथ अपराध है।
'यावज्जीवं जडो दहेत्'। यह पंक्ति असाधारण है। 'दहन' का रूपक चाणक्य ने सायास चुना है। अग्नि का दहन दो प्रकार का होता है। एक वह जो पकाता है, प्रकाशित करता है, परिष्कृत करता है; दूसरा वह जो केवल नष्ट करता है। मूर्ख व्यक्ति का जीवन दूसरे प्रकार का दहन है। वह चारों ओर ताप फैलाता है। परिवार की आशाओं को, समाज के विश्वास को, अपने सम्भावित भविष्य को। और यह दहन मृत्यु तक नहीं रुकता। मृत शिशु की पीड़ा एक दिन की होती है, परन्तु जड़ व्यक्ति के कारण होने वाली पीड़ा दशकों तक खिंचती रहती है।
आज के युग में जब सूचना का अम्बार है, फिर भी विवेक का अकाल है, तब चाणक्य का यह श्लोक और प्रासंगिक हो जाता है। सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने वाला, झूठी खबरों को वायरल करने वाला, पद पर बैठकर अयोग्य निर्णय लेने वाला, ये सभी उस 'जड़' की आधुनिक परिभाषाएं हैं जिसकी चाणक्य ने कल्पना की थी।
परन्तु इस श्लोक में एक आशा का संकेत भी है कि चाणक्य मूर्खता को अपरिवर्तनीय नहीं मानते। वे शिक्षा, संगति और विवेक की साधना को मनुष्य का सर्वोच्च कर्तव्य मानते हैं। यह श्लोक निन्दा नहीं, एक चेतावनी है कि जागो, सीखो, विचारो। क्योंकि जीवन की सार्थकता उसकी लम्बाई में नहीं, उसकी गहराई में है। चाणक्य की यह वाणी कठोर है, किन्तु करुणा से रहित नहीं। वे उस समाज की पीड़ा को वाणी देते हैं जो मूर्खता के बोझ तले दबा होता है और उस व्यक्ति को भी झकझोरते हैं जो जड़ता में डूबा, अपनी मनुष्यता को व्यर्थ कर रहा है।
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