Thought of the day आज का सुविचार : विद्या से विनम्रता, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन और धन से…

Quote of the day: नारायण पंडित ने हितोपदेश नामक ग्रंथ की रचना की है जिसमें ज्ञान के मोती समेटे गए हैं। नारायण ने ग्रंथ के प्रारंभ में ही विद्या के महत्व पर गहरा प्रकाश डाला है। 'विद्या ददाति विनयम्' के श्लोक में बड़ा गूढ़ भाव छिपा है। आइए उसकी व्याख्या जानते हैं।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड9 Mar 2026, 08:32 AM IST
हितोपदेश से आज का सुविचार
हितोपदेश से आज का सुविचार

श्लोक

विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।

पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥

भावार्थ: विद्या मनुष्य को नम्रता देती है और नम्रता से योग्यता, योग्यता से धन, धन से धर्म, फिर धर्म से सुख पाता है।

ज्ञान से सुख तक की पंचसोपानी यात्रा

हितोपदेश का यह श्लोक भारतीय दर्शन के सबसे सुंदर और सुगठित सूत्रों में से एक है। इसकी विशेषता यह है कि यह एक शृंखला प्रस्तुत करता है। एक कड़ी दूसरी से जुड़ी है, एक सोपान दूसरे का आधार है। विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख। यह केवल एक नैतिक उपदेश नहीं, यह जीवन के विकास का एक क्रमबद्ध मानचित्र है। और इस मानचित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका प्रारंभ विद्या से होता है और अंत सुख पर, किंतु यह सुख भोग का सुख नहीं, धर्म से अर्जित सुख है।

प्रथम सोपान : ज्ञान विनम्रता देता है

श्लोक का प्रारंभिक पद ही एक क्रांतिकारी विचार है। सामान्यतः यह माना जाता है कि विद्या से अहंकार आता है। 'पढ़े-लिखे' लोग प्रायः अपनी विद्वत्ता का दंभ दिखाते हैं। किंतु हितोपदेश कहता है कि यदि विद्या से विनय नहीं आया तो वह वास्तविक विद्या नहीं, वह केवल सूचनाओं का संग्रह है।

वास्तविक ज्ञान मनुष्य को यह बताता है कि वह कितना कम जानता है। जैसे-जैसे ज्ञान का क्षितिज विस्तृत होता है, वैसे-वैसे अज्ञान का बोध भी गहरा होता है। सुकरात ने कहा था, 'मैं केवल यह जानता हूं कि मैं कुछ नहीं जानता।' यही वास्तविक ज्ञान की पहचान है। जो व्यक्ति जितना अधिक सीखता है, वह उतना ही विनम्र होता जाता है क्योंकि वह जान लेता है कि ज्ञान का सागर अनंत है और उसने केवल एक बूंद ही चखी है।

सामाजिक दृष्टि से भी यह सत्य है। जो नेता, विचारक या वैज्ञानिक सच्चे ज्ञानी हैं, वे विनम्र हैं। स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, एपीजी अब्दुल कलाम, इन सबकी विनम्रता उनकी महानता का एक अभिन्न अंग थी। विनम्रता कमजोरी नहीं, वह ज्ञान की परिपक्वता का प्रमाण है।

द्वितीय सोपान : विनम्रता से योग्यता

विनम्रता और योग्यता का यह संबंध अत्यंत सूक्ष्म है। जो व्यक्ति विनम्र है, वह सीखने के लिए सदा तत्पर रहता है। अहंकारी व्यक्ति कहता है, 'मुझे सब आता है।' विनम्र व्यक्ति कहता है, 'मुझे और सीखना है।' इस अंतर में ही योग्यता का रहस्य छिपा है।

विनम्र व्यक्ति दूसरों की बात सुनता है, दूसरों से सीखता है, अपनी गलतियां स्वीकार करता है और सुधार करता है। यही प्रक्रिया उसे क्रमशः अधिक योग्य, अधिक कुशल और अधिक परिपक्व बनाती है। पात्रता का अर्थ है उस योग्यता का विकास जो जिम्मेदारियों का वहन कर सके, जो विश्वास का अधिकारी हो। ऐसा पात्र समाज में सम्मान पाता है और उसे वे अवसर मिलते हैं जो अहंकारी को कभी नहीं मिलते।

तृतीय सोपान : योग्यता से धन

यह सोपान एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक सत्य को उजागर करता है। जो व्यक्ति वास्तव में योग्य है, जो अपने कार्य में दक्ष है, जिस पर समाज विश्वास करता है, उसके पास धन स्वाभाविक रूप से आता है। यहां धन का अर्थ केवल मुद्रा नहीं, इसमें सामाजिक प्रतिष्ठा, संबंध, अवसर और संसाधन सब समाहित हैं।

श्लोक यह भी कह रहा है कि धन का सही क्रम क्या है। पहले विद्या, फिर विनय, फिर योग्यता और तब धन। जो इस क्रम को उलट देते हैं, जो बिना योग्यता के, बिना विनय के, बिना विद्या के केवल चालाकी या शोषण से धन अर्जित करते हैं, उनका वह धन न स्थायी होता है, न सम्मानजनक। आज के समाज में भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति इसी का प्रमाण है।

चतुर्थ सोपान : धन से धर्म

यह सोपान इस श्लोक का सबसे क्रांतिकारी और सबसे विचारणीय पद है। सामान्यतः धर्म और धन को विरोधी माना जाता है, 'धन है तो धर्म कहां?' किंतु हितोपदेश कह रहा है, 'धन से धर्म।' इसका अर्थ यह है कि जब व्यक्ति के पास अपनी आवश्यकताओं से अधिक संसाधन हों, तभी वह दान, सेवा, परोपकार और सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह कर सकता है।

खाली पेट व्यक्ति धर्म की चर्चा तो कर सकता है, किंतु धर्म का आचरण कठिन हो जाता है। इसीलिए चाणक्य ने भी कहा, 'अर्थ के बिना धर्म की सिद्धि नहीं।' धनी व्यक्ति जब अपने धन को समाज की सेवा में लगाता है, अस्पताल बनाता है, विद्यालय खोलता है, निर्धनों की सहायता करता है, तब वह धर्म का आचरण कर रहा होता है। टाटा, विप्रो के अजीम प्रेमजी और आधुनिक परोपकारियों का जीवन इसी सूत्र की सजीव व्याख्या है।

पंचम सोपान : धर्म से सुख

और अंत में सुख। किंतु यह सुख भोग का सुख नहीं है, संचय का सुख नहीं है, यह धर्माचरण से उत्पन्न आत्मिक सुख है। जब व्यक्ति जानता है कि उसका धन न्यायपूर्वक अर्जित हुआ, उसकी योग्यता विनम्रता से संवरी, और उसके साधनों का उपयोग समाज के लिए हुआ, तब जो संतोष और शांति उसे मिलती है, वह किसी बाजार में नहीं खरीदी जा सकती।

यह सुख स्थायी है क्योंकि इसकी जड़ें धर्म में हैं। और धर्म की जड़ें योग्यता में, योग्यता की जड़ें विनय में और विनय की जड़ें विद्या में हैं। यह एक ऐसा वृक्ष है जिसकी नींव गहरी है, इसे कोई तूफान नहीं उखाड़ सकता।

एक अखंड शृंखला

यह श्लोक जीवन को एक अखंड, तार्किक और नैतिक यात्रा के रूप में देखता है। विद्या → विनय → पात्रता → धन → धर्म → सुख — यह शृंखला टूटनी नहीं चाहिए। जो कड़ी भी छोड़ी जाए, पूरी शृंखला कमजोर हो जाती है। यही हितोपदेश का सर्वोच्च संदेश है- जीवन में शॉर्टकट नहीं, प्रत्येक सोपान को पूर्ण निष्ठा से पार करो। तब सुख स्वयं तुम्हारे द्वार पर आएगा।

और भी आज के सुविचार पढ़ने के लिए क्लिक करें।

Get Latest real-time updates

Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.

होमट्रेंड्सThought of the day आज का सुविचार : विद्या से विनम्रता, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन और धन से…
More
होमट्रेंड्सThought of the day आज का सुविचार : विद्या से विनम्रता, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन और धन से…