
भावार्थ: अत्यन्त सीधे स्वभाव से नहीं रहना चाहिये। इस कारण कि वन में जाकर देखो- सीधे वृक्ष काटे जाते हैं और टेढ़े खड़े रहते हैं।
चाणक्य केवल एक राजनीतिज्ञ नहीं, बल्कि मानव स्वभाव के गहनतम मर्मज्ञ थे। उन्होंने इस श्लोक में एक ऐसी सत्य-वेदना व्यक्त की है जो सुनने में कठोर लगती है, किंतु जीवन के व्यावहारिक धरातल पर बार-बार सिद्ध होती है। वे कहते हैं कि अत्यन्त सरल, निष्कपट और सीधे स्वभाव से नहीं रहना चाहिये। प्रमाण के रूप में वे प्रकृति का एक सहज दृश्य प्रस्तुत करते हैं। चाणक्य कहते हैं कि वन में सीधे वृक्ष पहले काटे जाते हैं और टेढ़े-मेढ़े वृक्ष खड़े रहते हैं। यह मानव समाज के एक गहरे यथार्थ की ओर संकेत है।
दर्शन की दृष्टि से यहां एक महत्त्वपूर्ण भेद समझना आवश्यक है। और वह है सरलता और भोलेपन में अंतर। सरलता एक गुण है; भोलापन एक दुर्बलता। जो व्यक्ति इतना पारदर्शी हो जाता है कि उसके मन की प्रत्येक बात, उसकी प्रत्येक सीमा और उसका प्रत्येक स्वार्थ सबको दिखने लगे तो वह व्यक्ति अपनी ही निर्बलता का विज्ञापन करने लगता है। चाणक्य यहां नैतिकता का विरोध नहीं कर रहे, वे आरक्षित मर्यादाओं के आत्मप्रकाशन का विरोध कर रहे हैं।
भारतीय दर्शन में माया की अवधारणा केवल आध्यात्मिक नहीं है, वह सांसारिक व्यवहार में भी लागू होती है। संसार माया से आच्छादित है। यानी यहां प्रत्येक वस्तु वैसी नहीं, जैसी दिखती है। ऐसे जगत में जो व्यक्ति पूर्णतः निर्माया होकर चलता है, वह उन शक्तियों का सहज शिकार बन जाता है जो उसकी सरलता का लाभ उठाने में संकोच नहीं करतीं।
समाजशास्त्र की दृष्टि से यह श्लोक और भी प्रासंगिक हो जाता है। इतिहास साक्षी है कि समाज में अति सरल, अति विश्वासी और अति उदार व्यक्ति प्रायः शोषण का केंद्र बनते हैं। परिवार हो, कार्यस्थल हो, राजनीति हो या व्यापार, जो व्यक्ति अपनी हां को हां और ना को ना कहना नहीं जानता, जो अपनी सीमाओं की रक्षा करना नहीं जानता, वह धीरे-धीरे उपयोगी वस्तु मात्र बन जाता है।
वृक्ष का रूपक यहां अत्यन्त सटीक है। सीधा वृक्ष इमारती लकड़ी के लिए उपयुक्त होता है, वह काम आता है, इसीलिए काटा जाता है। टेढ़ा वृक्ष किसी के किसी विशेष काम का नहीं होता, इसलिए वह उपेक्षित रहकर भी जीवित रहता है। यह संसार का एक कड़वा सत्य है कि उपयोगिता और संरक्षण में सदा सामंजस्य नहीं होता।
चाणक्य का संदेश यह नहीं है कि असत्य बोलो, छल करो या दुर्जन बनो। उनका संदेश है कि विवेकशील बनो। जानो कि कब, कहां, किसके सामने, कितना खुलना है। अपनी शक्तियां और दुर्बलताएं सबके सम्मुख उजागर मत करो। नीति और व्यवहार में एक सुरक्षात्मक आवरण रखो, जैसे कछुआ अपना कवच कभी नहीं छोड़ता।
यहां कूटनीति का वह तत्त्व है जो केवल राज्य के लिए नहीं, व्यक्ति के लिए भी उतना ही आवश्यक है। स्वयं को पूर्णतः अनुमानयोग्य बना देना रणनीतिक दृष्टि से आत्मघाती है। आप क्या कर सकते हैं, क्या करने वाले हैं और क्या करेंगे, इसका अनुमान अगर कोई या अधिकतर लोग लगा पा रहे हैं तो समझिए आप बहुत सरल, इसलिए बहुत दुर्बल हैं।
शक्ति इस बात में निहित है कि लोग आपके बारे में अटकलें लगाते रहें, परंतु कभी वह आश्वस्त नहीं हो सकें कि आप यही करने वाले हैं। आपकी प्रतिक्रिया, आपका अगला कदम कोई आसानी से भांप रहा है, तो समझिए आपको अपने में त्वरित गति से सुधार की घोर अनिवार्यता है।
आज के युग में जब सोशल मीडिया पर व्यक्ति अपने जीवन की प्रत्येक परत उघाड़ देता है, जब कार्यालयों में लोग अपनी सम्पूर्ण कमजोरियां सहकर्मियों को बता देते हैं, और जब राजनीति में नेता अपनी सम्पूर्ण रणनीति पहले ही घोषित कर देते हैं, तब चाणक्य का यह श्लोक एक सावधानी की घंटी बजाता है।
चाणक्य कभी नहीं कहते कि सज्जनता त्याग दो, वह तो केवल सावधान करते हैं कि सज्जनता को दुर्बलता मत बनने दो। हृदय में निर्मलता रखो, किन्तु व्यवहार में परिस्थिति के अनुसार लचीलापन भी रखो। जैसे टेढ़ा वृक्ष अपनी प्रकृति से नहीं, अपनी स्थिति से बचता है, वैसे ही बुद्धिमान मनुष्य परिस्थिति को समझकर अपनी रक्षा करता है। यही चाणक्य की नीति का सार है- जीवित रहना भी एक कला है।
और भी आज का विचार पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.
More