
भावार्थ : संतान के बिना घर शून्य है, बंधु के बिना दिशा शून्य है। मूर्ख का हृदय शून्य है और दरिद्रता सबसे बड़ा शून्य है।
चाणक्य ने जब यह श्लोक लिखा, तो उन्होंने केवल नीति नहीं कही, एक दार्शनिक मानचित्र रचा। इस मानचित्र पर चार बिंदु हैं, और चारों पर एक ही शब्द अंकित है: शून्य। पर यह बौद्ध दर्शन का निर्वाणकारी शून्य नहीं, अपितु यह वह शून्य है जो भीतर से खाता है, जो जीवन को चलते-चलते खोखला कर देता है।
अपुत्रस्य गृहं शून्यम् अर्थात जिसके कोई संतान नहीं, उसका घर शून्य है। आज के संदर्भ में इसे केवल पुत्र तक सीमित करना उचित नहीं होगा। चाणक्य का आशय संतान से है, उस उत्तराधिकार से है जो जीवन को एक निरंतरता देता है। घर की दीवारें तब भी खड़ी रहती हैं, छत तब भी होती है, किंतु जब कोई बालक की हंसी उस छत से टकराकर न लौटे, जब कोई चरण उस आंगन में दौड़ता न हो, तो वह भवन गृह नहीं रहता।
गृह का अर्थ ही है जहां प्राण बसें। संतान उस प्राण का स्पंदन है। इसीलिए अथर्ववेद में कहा गया है कि गृह की पूर्णता परिवार में है, ईंटों में नहीं। यह शून्यता भौतिक नहीं, भावनात्मक है। यह वह रिक्तता है जो कोई वास्तु-शिल्प नहीं भर सकता।
दिशः शून्यस्त्वबन्धवाः अर्थात जिसका कोई बंधु नहीं, उसके लिए सभी दिशाएं रिक्त हैं। यह श्लोक का सबसे काव्यात्मक अंश है। दिशाओं का रूपक अत्यंत सटीक है। जब मनुष्य यात्रा पर निकलता है, संकट में होता है, या सफलता के शिखर पर खड़ा होता है, तो वह किसी दिशा में देखता है। उस दिशा में यदि कोई परिचित मुख न हो, तो वह दिशा निर्जन वन बन जाती है।
बन्धु केवल रक्त-सम्बन्धी नहीं होते। चाणक्य की राजनीतिक दृष्टि में मित्र, सहयोगी, और विश्वस्त व्यक्ति भी बन्धु की श्रेणी में आते हैं। जो मनुष्य अपने अहंकार में या अपनी उदासीनता में इन सम्बन्धों को सींचना भूल जाता है, वह एक दिन पाता है कि चारों ओर केवल अजनबी हैं। भरी दुनिया में भी अकेलापन। यही इस पंक्ति का मर्म है।
मूर्खस्य हृदयं शून्यम्। यह पंक्ति सबसे गहरी दार्शनिक टिप्पणी है। चाणक्य यहां स्पष्ट करते हैं कि मूर्खता केवल बुद्धि का अभाव नहीं है, वह हृदय का अभाव है। जो व्यक्ति करुणा, विवेक और अनुभव से सीखने में असमर्थ है, वह ज्ञान के मंदिर के द्वार पर खड़ा होकर भी भीतर नहीं जा पाता। उपनिषद् कहते हैं, 'श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः' अर्थात श्रेय और प्रेय, दोनों मनुष्य के सामने आते हैं। मूर्ख प्रेय को चुनता है, श्रेय को नहीं पहचान पाता। उसका हृदय शून्य इसलिए नहीं कि उसमें भावनाएं नहीं, बल्कि इसलिए कि उन भावनाओं को दिशा देने वाला विवेक नहीं। वह हृदय एक बंद कोठरी जैसा है, जिसमें प्रकाश का मार्ग नहीं।
सर्वशून्या दरिद्रता। और यहां चाणक्य अपने श्लोक को उस उच्चतम बिंदु पर ले जाते हैं जहां सारी पूर्ववर्ती शून्यताएं एक में समाहित हो जाती हैं। दरिद्रता केवल धन का अभाव नहीं है। वह एक ऐसी अवस्था है जो एक साथ गृह को भी शून्य करती है, दिशाओं को भी, और हृदय को भी। भूखे मनुष्य का आत्मसम्मान क्षीण होता है, सम्बन्ध दूर होते हैं, और विचार केवल जीविका के इर्द-गिर्द सिमट जाते हैं। इसीलिए अर्थशास्त्र में चाणक्य ने कहा है कि राज्य का प्रथम कर्तव्य है नागरिक को दरिद्रता से मुक्त करना, क्योंकि दरिद्र नागरिक न धर्म का पालन कर सकता है, न राष्ट्र की रक्षा।
यह श्लोक आज की भागती हुई सभ्यता से एक शांत प्रश्न पूछता है कि क्या हम उन शून्यताओं को भरने में लगे हैं जो वास्तव में हमें खोखला कर रही हैं? संतान की उपेक्षा कर करियर बनाना, सम्बन्धों को विसर्जित कर एकांत में जीना, ज्ञान से मुंह फेरकर सतह पर तैरना, और आर्थिक विषमता को स्वीकार कर लेना। ये सब उसी शून्य के आधुनिक रूप हैं जिनकी पहचान चाणक्य ने शताब्दियों पूर्व कर ली थी। शून्य भरा जा सकता है, पर केवल तभी जब उसे पहचाना जाए। और पहचान का पहला पड़ाव है, यह स्वीकार करना कि हमारे भीतर कुछ रिक्त है।
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