Quote of the day आज का सुविचार: विष में अमृत, मिट्टी में सोना, दुष्ट में उत्तम विद्या हो तो...

Quote of the day: चाणक्य कहते हैं कि किसी वस्तु का आवरण, किसी व्यक्ति की पहचान मायने नहीं रखती। मायने रखता है वस्तु या व्यक्ति का गुण। चाणक्य का कहना है कि मूल्यवान वस्तु कीचड़ में भी पड़ा हो तो उठा लो और गुण किसी दुष्ट में भी हो, तो सीख लो। 

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड11 Mar 2026, 09:25 AM IST
आज का सुविचार
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श्लोक

विषादप्यमृतंग्राह्यममेध्यादपिकांचनम् ।

नीचादप्युत्तमांवियांस्त्रीरत्नंदुष्कुलादपि ॥

भावार्थ : विष में सभी अमृत को, अशुद्ध पदार्थों में से भी सोने को, नीचे से भी उत्तम विद्या को, और दुष्ट कुल से भी स्त्री रत्न को लेना योग्य है।

विवेकशील ग्रहण का दर्शन

चाणक्य नीति का यह श्लोक भारतीय चिंतन की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जो कहती है- सत्य, सौंदर्य और श्रेष्ठता का कोई एक निश्चित स्रोत नहीं होता। वह जहां भी मिले, जिस भी रूप में मिले, जिस भी व्यक्ति या परिस्थिति से मिले, उसे ग्रहण करना विवेकशील मनुष्य का लक्षण है। यह श्लोक संकीर्णता पर, पूर्वाग्रह पर और अहंकार पर एक तीखा और निर्णायक प्रहार है।

परिस्थिति से परे देखने की दृष्टि

चाणक्य का प्रथम उदाहरण सबसे नाटकीय और सबसे गहरा है। विष और अमृत, दो परस्पर विरोधी तत्त्व। किंतु यदि विष में कहीं अमृत का अंश हो तो उसे छोड़ना मूर्खता है। यह केवल रासायनिक या औषधीय सत्य नहीं, यह जीवन-दर्शन का एक मूलभूत सिद्धांत है।

आयुर्वेद में 'विषस्य विषमौषधम्' का सिद्धांत है। यानी विष से ही विष की औषधि बनती है। अनेक घातक पदार्थ उचित मात्रा और उचित प्रक्रिया से जीवनरक्षक औषधि बन जाते हैं। आधुनिक चिकित्साविज्ञान में कीमोथेरेपी, रेडियेशन- ये सब इसी सिद्धांत पर आधारित हैं।

जीवन के व्यापक संदर्भ में यह सूत्र यह कहता है कि कोई भी परिस्थिति, कोई भी संघर्ष, कोई भी कष्ट, यदि उसमें से कुछ सीखने योग्य, कुछ ग्रहण करने योग्य हो, तो उसे अवश्य लो। जो व्यक्ति कठिनाइयों में से भी अपने लिए कोई सीख निकाल लेता है, जो असफलताओं में से भी ज्ञान अर्जित करता है, वही वास्तव में विवेकशील है। पूर्वग्रह से ग्रस्त मनुष्य कठिन परिस्थिति को देखकर ही मुंह फेर लेता है और उसमें छिपे अमृत से वंचित रह जाता है।

मूल्य को पहचानने की क्षमता

दूसरा उदाहरण उतना ही व्यावहारिक है। सोना यदि मिट्टी में, कीचड़ में या अशुद्ध पदार्थों में दबा हो तो क्या उसे छोड़ दिया जाए? कोई भी विवेकशील व्यक्ति ऐसा नहीं करेगा। सोने का मूल्य उसके आवरण से नहीं, उसके स्वभाव से है।

यह सूत्र समाज को एक गहरा संदेश देता है कि व्यक्ति, विचार या वस्तु का मूल्यांकन उसके बाहरी आवरण से नहीं, उसके वास्तविक गुणों से करो। कितने ही प्रतिभाशाली व्यक्ति निर्धन परिवारों में, उपेक्षित समुदायों में, दूरस्थ ग्रामों में जन्म लेते हैं और समाज उनकी बाहरी परिस्थिति देखकर उनकी प्रतिभा को अनदेखा कर देता है। यह सामाजिक मूर्खता है। डॉ. अंबेडकर, रामानुजन, कबीर, ये सब वे 'सोने' थे जो अशुद्ध समझे जाने वाले परिवेश में थे, किंतु उनका मूल्य असाधारण था।

ज्ञान का कोई जाति-वर्ण नहीं

तीसरा सूत्र सबसे अधिक सामाजिक क्रांति का वाहक है। चाणक्य कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति समाज में 'नीच' समझा जाता हो, किंतु उसके पास उत्तम विद्या हो तो वह विद्या अवश्य ग्रहण करो।

यह उस समाज के लिए एक सीधी चुनौती है जो ज्ञान के स्रोत को व्यक्ति की जाति, कुल या सामाजिक स्थिति से जोड़ता है। ज्ञान का कोई वर्ण नहीं होता, विद्या की कोई जाति नहीं होती। यदि कोई शिल्पकार अपने शिल्प में निपुण है, यदि कोई कृषक प्रकृति का गहरा ज्ञान रखता है, यदि कोई वनवासी वनस्पतियों की चिकित्सीय शक्ति जानता है, तो उनसे सीखना श्रेष्ठता का ह्रास नहीं, विवेक का प्रमाण है।

महाभारत में युधिष्ठिर ने यक्ष से, गीता में अर्जुन ने कृष्ण से, और स्वयं चाणक्य ने चंद्रगुप्त जैसे साधारण कुल के बालक में असाधारण संभावना देखकर उसे सम्राट बनाया। भगवान राम ने मृत्यु शैय्या पर पड़े रावण के पास अपने भाई लक्ष्मण को ज्ञान लेने के लिए भेजा। यही इस सूत्र की जीवंत व्याख्याएं हैं।

आज के युग में यह सूत्र और भी प्रासंगिक है। पश्चिम का विज्ञान हो, जापान की प्रबंधन-कला हो, किसी भी देश की श्रेष्ठ परंपरा हो, यदि वह उत्तम है तो ग्रहण करने योग्य है। पूर्वग्रह से ग्रस्त होकर 'यह विदेशी है' या 'यह उस जाति का है' कहकर उत्तम विद्या को नकारना मूर्खता है।

व्यक्तित्व कुल से नहीं, कर्म से बनता है

चौथा सूत्र भी उतना ही सूक्ष्म है। यदि कोई स्त्री असाधारण गुणों, प्रतिभा और चरित्र से संपन्न हो, तो उसके कुल की हीनता उसकी श्रेष्ठता को नष्ट नहीं करती। व्यक्तित्व का निर्माण वंश से नहीं, संस्कार और कर्म से होता है। यह सूत्र उस सामाजिक संकीर्णता पर प्रहार करता है जो विवाह, मित्रता या सहयोग में केवल कुल देखती है, व्यक्ति नहीं। जब कुल को व्यक्ति से अधिक महत्त्व दिया जाता है, तो समाज अनगिनत प्रतिभाओं और श्रेष्ठ व्यक्तित्वों से वंचित रह जाता है।

विवेकशील ग्रहण की संस्कृति

इन चारों सूत्रों में एक ही दर्शन है कि श्रेष्ठता का स्रोत नहीं, स्वरूप देखो। पूर्वाग्रह, संकीर्णता और अहंकार, ये तीनों मनुष्य को उस अमृत से वंचित करते हैं जो कभी-कभी विष के आवरण में भी छिपा होता है। चाणक्य का यह सूत्र एक खुले, विवेकशील और परिपक्व समाज का आह्वान है जो गुण को पहचाने, चाहे वह जहां भी हो।

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