आज का सुविचार : विद्या वह गुप्त धन जो न चुराया जा सके, न जलाया जा सके

Quote of the day : चाणक्य का यह श्लोक अंततः एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिए जाने वाले उस संदेश का सार है जो हर मां-बाप अपने बच्चे को देना चाहते हैं, जो भी दे सकते हैं दे दो, किन्तु यदि एक ही चीज देनी हो तो विद्या दो।  

Naveen Kumar Pandey
पब्लिश्ड16 Apr 2026, 06:07 PM IST
चाणक्य नीति से आज का सुविचार
चाणक्य नीति से आज का सुविचार

चाणक्य नीति श्लोक

कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी।

प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम्॥

भावार्थ : विद्या में कामधेनु के समान गुण है क्योंकि यह अकाल में भी फल देती है। विदेश में यह माता के समान है। विद्या को गुप्त धन कहते हैं।

तीन रूपकों में एक सत्य

चाणक्य ने इस एक श्लोक में विद्या को तीन रूपकों से परिभाषित किया है कि कामधेनु, माता और गुप्त धन। ये तीनों रूपक पृथक नहीं, एक ही सत्य के तीन आयाम हैं।

कामधेनु : पुराणों में वह दिव्य गाय जो मनवांछित फल देती है, जिसकी उत्पत्ति समुद्रमंथन से हुई। चाणक्य कहते हैं, विद्या उसी के समान है। किन्तु यहां एक सूक्ष्म विशेषण और जोड़ा है, अकाले फलदायिनी। अर्थात् जब संसार के सभी साधन काम आना बंद कर दें, जब समय प्रतिकूल हो, सौभाग्य ने मुंह फेर लिया हो, तब भी विद्या फल देती है। कामधेनु भौतिक थी, विद्या आत्मिक है। और इसीलिए वह श्रेष्ठतर है।

माता : प्रवास में माता का स्मरण क्यों होता है? क्योंकि माता बिना स्वार्थ के, बिना शर्त के, बिना किसी प्रतिदान की अपेक्षा किए रक्षा करती है। परदेस में जब कोई अपना नहीं होता, तब विद्या उसी ममत्व से थाम लेती है। वह संकट में मार्ग दिखाती है, एकाकीपन में साथ देती है, अपरिचित वातावरण में पहचान बनाती है।

गुप्त धन : यह तीसरा और सर्वाधिक दार्शनिक रूपक है। स्वर्ण छिन सकता है, भूमि छिन सकती है, राज्य तक छिन जाते हैं, किन्तु जो ज्ञान एक बार चित्त में उतर गया, उसे कोई राजा, कोई डाकू, कोई दुर्भाग्य नहीं छीन सकता। इसीलिए वह गुप्त है, छिपा हुआ, सुरक्षित, अविनाशी।

कामधेनु विद्या वही है जो व्यक्ति को परिस्थितियों का दास नहीं, स्वामी बनाए। जो प्रश्न पूछना सिखाए, उत्तर रटना नहीं। जो विपरीत परिस्थिति में भी चेतना को जागृत रखे।

भीतर का वह दीपक

भारतीय ज्ञान-परंपरा में विद्या को सदा बाह्य उपलब्धि नहीं, आंतरिक रूपान्तरण माना गया है। उपनिषदों में ब्रह्मविद्या का अर्थ ही है। वह ज्ञान जो आत्मा को जानने में सहायक हो। चाणक्य अर्थशास्त्र के आचार्य थे, किन्तु उनकी नीति में भी यह भारतीय मूल-दृष्टि सुरक्षित है कि विद्या केवल जीविका का साधन नहीं, अपितु वह जीवन की शक्ति है।

अकाले फलदायिनी में एक गहरा दर्शन है। काल अर्थात समय भारतीय चिंतन में सबसे बड़ा नियामक है। महाभारत में युधिष्ठिर से जब यक्ष ने पूछा कि सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है, तो उत्तर था कि प्रतिदिन मनुष्य मरते देखकर भी मनुष्य स्वयं को अमर मानता है। इसी काल की क्रूरता के सामने विद्या एकमात्र ऐसा तत्त्व है जो अपना स्वभाव नहीं बदलती। संपत्ति काल के साथ क्षीण होती है, स्वास्थ्य काल के साथ जाता है, किन्तु विद्या? वह परिपक्व होती है, गहरी होती है, और अंत में मुक्ति का मार्ग बन जाती है।

वह हथियार जो हाशिये पर खड़े लोगों ने उठाया

चाणक्य का यह श्लोक केवल व्यक्तिगत नीति नहीं, एक सामाजिक घोषणापत्र भी है। इतिहास गवाह है कि जब-जब वंचित समुदायों ने विद्या का आश्रय लिया, तब-तब सत्ता के समीकरण बदले। संविधान निर्माता बाबासाहेब अम्बेडकर को विद्या ने वह सब दिया जो किसी और साधन ने नहीं दे सकते थे।

प्रवासे मातृसदृशी का सामाजिक पाठ और भी मार्मिक है। आज करोड़ों भारतीय अपने गांव-घर से कटकर महानगरों में, विदेशों में जीविका खोज रहे हैं। इस विस्थापन में जो टिके रहते हैं, वे वही हैं जिनके पास विद्या की पूंजी है। बाकी सब असुरक्षा की भंवर में फंसते हैं। विद्या यहां केवल डिग्री नहीं, अपितु वह कौशल, वह विवेक, वह आत्मविश्वास है जो व्यक्ति को किसी भी परिवेश में जड़ें जमाने की शक्ति देता है।

जब सूचना को विद्या समझने की भूल हो रही है

यहां एक आवश्यक सावधानी भी है। चाणक्य जिस विद्या की बात करते हैं, वह सूचना-संचय नहीं है। आज के डिजिटल युग में हम सूचनाओं से भरे हैं, किन्तु विद्या से खाली होते जा रहे हैं। गूगल पर सब कुछ उपलब्ध है, किन्तु संकट के क्षण में जो काम आता है वह भीतर की समझ है, बाहर की खोज नहीं। कामधेनु विद्या वही है जो व्यक्ति को परिस्थितियों का दास नहीं, स्वामी बनाए। जो प्रश्न पूछना सिखाए, उत्तर रटना नहीं। जो विपरीत परिस्थिति में भी चेतना को जागृत रखे।

गुप्त धन की विरासत

चाणक्य का यह श्लोक अंततः एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिए जाने वाले उस संदेश का सार है जो हर मां-बाप अपने बच्चे को देना चाहते हैं, जो भी दे सकते हैं दे दो, किन्तु यदि एक ही चीज देनी हो तो विद्या दो। क्योंकि वही एकमात्र धन है जो देने से बढ़ता है, बाँटने से घटता नहीं, और अग्नि, जल, काल, किसी से नष्ट नहीं होता।

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