
भावार्थ: किस के कुल में दोष नहीं है, व्याधी ने किसे पीड़ित न किया, किसको दुःख न मिला, किसको सदा सुख ही रहा।
चाणक्य नीति का यह श्लोक चार छोटे-छोटे प्रश्नों में जीवन का एक विराट सत्य समेट देता है। यह श्लोक किसी को उपदेश नहीं देता, किसी को आदर्श नहीं दिखाता, अपितु यह केवल एक दर्पण सामने रखता है और पूछता है- क्या कोई भी मनुष्य, कोई भी कुल, कोई भी समाज इन चार सत्यों से परे है? स्वाभाविक रूप से उत्तर 'नहीं' है और इसी 'नहीं' में एक गहरी मुक्ति छिपी है।
किस कुल में दोष नहीं है? यह प्रश्न उस सामाजिक अहंकार पर सीधा प्रहार है जो मनुष्य को अपने वंश, अपनी जाति, अपने परिवार पर गर्व करते-करते दूसरों को हेय दृष्टि से देखने लगाता है। भारतीय समाज में और वस्तुतः संसार के हर समाज में कुल-गौरव एक ऐसी भावना है जो एक सीमा तक प्रेरणादायी है, किंतु जब यह अहंकार बन जाती है तो विभाजन और भेदभाव का कारण बनती है।
चाणक्य यहां कहते हैं- रुको, थोड़ा भीतर झांको। रामायण के राजवंश में भी दोष थे, महाभारत के कुरुवंश में भी। जिस कुल को तुम श्रेष्ठ समझते हो, उसके इतिहास में भी कोई न कोई कलंक अवश्य है। और जिस कुल को तुम हीन समझते हो, उसमें भी कोई न कोई रत्न अवश्य उत्पन्न हुआ होगा। कुल की श्रेष्ठता वंश से नहीं, कर्म से होती है और यह बोध तभी आता है जब हम यह स्वीकार करते हैं कि कोई भी कुल दोषमुक्त नहीं है।
सामाजिक दृष्टि से यह प्रश्न जाति-व्यवस्था, वर्ग-गर्व और पारिवारिक अहंकार पर एक तीखा व्यंग्य है। जो समाज अपने कुल के दोषों को छिपाकर दूसरे के कुल की कमियां गिनाता रहता है, वह कभी परिपक्व नहीं हो सकता।
किसे व्याधि ने पीड़ित नहीं किया? शरीर नश्वर है- यह सत्य जानते सब हैं, किंतु मानते कोई नहीं। रोग अमीर और गरीब में भेद नहीं करता, राजा और रंक को समान रूप से पीड़ित करता है। इतिहास के सबसे शक्तिशाली सम्राट भी रोगशय्या पर असहाय पड़े हैं। सिकंदर जिसने विश्व जीतने का स्वप्न देखा, वह तैंतीस वर्ष की आयु में व्याधि से हार गया।
यह प्रश्न मनुष्य को उसकी शारीरिक सीमाओं का बोध कराता है। और इस बोध में एक गहरी करुणा छिपी है। जब हम जानते हैं कि रोग सबको आता है तो रोगी के प्रति हमारा भाव दया का नहीं, सहानुभूति का होना चाहिए। रोग कोई दंड नहीं, कोई अपमान नहीं, वह जीवन की एक अनिवार्य अवस्था है। यह बोध समाज में रोगियों के प्रति सम्मान और सेवा की भावना उत्पन्न करता है।
किसे व्यसन अर्थात् दुःख और विपत्ति नहीं मिली? यहां 'व्यसन' का अर्थ केवल नशे की लत नहीं, इसका व्यापक अर्थ है संकट, विपत्ति, कठिनाई और पीड़ा। चाणक्य कह रहे हैं कि इस संसार में कोई भी ऐसा नहीं जिसके जीवन में दुःख न आया हो। राम को वनवास मिला, युधिष्ठिर को अज्ञातवास, हरिश्चंद्र को सब कुछ खोना पड़ा।
यह प्रश्न उस मानसिकता पर प्रहार करता है जो कहती है, 'मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ?' जब भी जीवन में कोई विपत्ति आती है, मनुष्य का पहला भाव होता है- आत्मदया और विशिष्टता का भ्रम कि वह अकेला ही पीड़ित है। चाणक्य इस भ्रम को तोड़ते हैं। दुःख तुम्हें विशिष्ट नहीं बनाता, वह तुम्हें मनुष्यता से जोड़ता है। यह बोध शोक को सहनीय बनाता है और पीड़ित को एकाकीपन से बाहर निकालता है।
किसका सुख निरंतर रहा? यह श्लोक का सबसे गहरा और सबसे दार्शनिक प्रश्न है। सुख और दुःख का परिवर्तन ही संसार का मूल नियम है। बौद्ध दर्शन में इसे 'अनित्यता' कहते हैं, हिंदू दर्शन में 'माया का चक्र' और आधुनिक मनोविज्ञान में 'Hedonic Treadmill' यानी मनुष्य सुख पाने पाकर शीघ्र ही उस सुख का अभ्यस्त हो जाता है और फिर असंतुष्ट हो जाता है।
जो व्यक्ति निरंतर सुख की खोज में है, वह सदा दुखी रहेगा क्योंकि निरंतर सुख इस संसार में किसी को नहीं मिला, न मिलता है, न मिलेगा। चाणक्य का यह प्रश्न उस मिथ्या आकांक्षा को भस्म कर देता है। और जब यह आकांक्षा मिटती है, तभी वास्तविक शांति की संभावना उत्पन्न होती है।
इन चारों प्रश्नों को एक साथ देखें तो एक विराट दर्शन उभरता है- दोष, रोग, दुःख और सुख-दुःख का परिवर्तन, ये सब मानव अस्तित्व के अनिवार्य अंग हैं। इन्हें नकारना अज्ञानता है, इनसे भागना कायरता है किंतु इन्हें स्वीकार करके उनके बीच समभाव से जीना ही वास्तविक ज्ञान है।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि दूसरे के कुल-दोष पर अहंकार मत करो, तुम्हारे कुल में भी दोष हैं। दूसरे की व्याधि पर उपेक्षा मत करो, तुम भी रोगी हो सकते हो। दूसरे के दुःख पर उदासीन मत रहो, तुम भी विपत्ति से अछूते नहीं हो। और दूसरे के सुख पर ईर्ष्या मत करो, उसका सुख भी स्थायी नहीं है।
चाणक्य ने इस श्लोक में कोई उत्तर नहीं दिया, केवल प्रश्न पूछे। और यही इस श्लोक की सबसे बड़ी शक्ति है। जब मनुष्य इन प्रश्नों का उत्तर अपने भीतर ढूंढता है, तो वह स्वयं इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि कोई भी पूर्ण नहीं, कोई भी अमर नहीं, कोई भी सदा सुखी नहीं। और इस 'नहीं' में एक अद्भुत समता का जन्म होता है, जो न अहंकार को टिकने देती है, न ईर्ष्या को, न निराशा को। यही समभाव भारतीय दर्शन की सर्वोच्च उपलब्धि है और चाणक्य के ये चार प्रश्न उसी उपलब्धि का द्वार हैं।
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