
भावार्थ: विधि (भाग्य, नियति अथवा परिस्थितियों का क्रम) कभी निर्धन व्यक्ति को राजा बना देती है और कभी राजा को निर्धन बना देती है। उसी प्रकार वह धनी को निर्धन तथा निर्धन को धनी भी बना सकती है। अर्थात संसार में धन, पद और वैभव स्थायी नहीं हैं; समय और परिस्थितियाँ किसी भी व्यक्ति की स्थिति बदल सकती हैं।
चाणक्य का यह श्लोक मानव जीवन के सबसे बड़े यथार्थों में से एक की ओर संकेत करता है कि संसार में कोई भी सामाजिक या आर्थिक स्थिति स्थायी नहीं है। इतिहास ऐसे असंख्य उदाहरणों से भरा है, जहां साधारण व्यक्ति सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचे और अत्यंत शक्तिशाली साम्राज्य कुछ ही वर्षों में ध्वस्त हो गए। इसलिए चाणक्य धन और पद को जीवन का अंतिम सत्य नहीं मानते, बल्कि उन्हें परिवर्तनशील परिस्थितियों का परिणाम बताते हैं।
यहां 'विधि' शब्द का अर्थ केवल दैवी भाग्य नहीं है। भारतीय चिंतन में विधि का आशय समय, परिस्थितियों, कर्मों के परिणाम और जीवन की अप्रत्याशित घटनाओं के संयुक्त प्रभाव से भी लिया जाता है। इसलिए इस श्लोक को केवल भाग्यवाद का समर्थन मानना उचित नहीं होगा।
पहली दृष्टि में ऐसा लग सकता है कि चाणक्य सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़ देने की सलाह दे रहे हैं। लेकिन यदि संपूर्ण चाणक्य नीति पढ़ी जाए तो स्पष्ट होता है कि वे परिश्रम, शिक्षा, नीति, दूरदर्शिता और आत्मसंयम को सफलता का मूल आधार मानते हैं। इसलिए इस श्लोक का आशय यह नहीं है कि कर्म का कोई महत्व नहीं। बल्कि इसका संदेश है कि मनुष्य को सफलता मिलने पर अहंकारी नहीं होना चाहिए और कठिन समय आने पर निराश भी नहीं होना चाहिए। परिस्थितियां बदलती रहती हैं, इसलिए विवेक और धैर्य बनाए रखना आवश्यक है।
विश्व इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहां साधारण परिवारों से आए लोग महान शासक, उद्योगपति या वैज्ञानिक बने। दूसरी ओर शक्तिशाली साम्राज्य, बड़े उद्योग समूह और अत्यंत संपन्न परिवार भी समय के साथ आर्थिक या राजनीतिक संकटों का सामना करते रहे। भारत के इतिहास में भी राजवंशों का उत्थान और पतन, व्यापारिक घरानों का विस्तार और अवनति, तथा आधुनिक अर्थव्यवस्था में कंपनियों के तेजी से उभरने और गिरने की घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि परिवर्तन जीवन का स्वाभाविक नियम है।
चाणक्य का यह विचार आज की अर्थव्यवस्था में भी उतना ही प्रासंगिक है। शेयर बाजार, व्यापार, स्टार्टअप और वैश्विक अर्थव्यवस्था में सफलता स्थायी नहीं होती। किसी कंपनी का बाजार मूल्य कुछ वर्षों में कई गुना बढ़ सकता है, तो आर्थिक मंदी, तकनीकी बदलाव या प्रबंधन की गलतियों के कारण वही कंपनी संकट में भी आ सकती है।
इसी प्रकार सामान्य परिवारों से आने वाले उद्यमी नवाचार और परिश्रम के बल पर बड़ी आर्थिक सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए धन को स्थायी उपलब्धि मानना और उसके आधार पर अहंकार करना बुद्धिमानी नहीं है।
यह श्लोक सामाजिक समानता का भी संकेत देता है। यदि आज का निर्धन व्यक्ति कल समृद्ध हो सकता है और आज का समृद्ध व्यक्ति कल कठिन परिस्थितियों में आ सकता है, तो केवल धन या पद के आधार पर किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करना उचित नहीं है। समाज में सम्मान का आधार व्यक्ति का चरित्र, ज्ञान, व्यवहार और नैतिकता होना चाहिए, न कि केवल उसकी आर्थिक स्थिति।
यह विचार मानसिक संतुलन बनाए रखने में भी सहायक है। सफलता मिलने पर व्यक्ति अक्सर स्वयं को अजेय समझने लगता है, जबकि असफलता मिलने पर उसे लगता है कि सब कुछ समाप्त हो गया। चाणक्य इन दोनों अतियों से बचने की सलाह देते हैं। यदि मनुष्य यह स्वीकार कर ले कि जीवन परिवर्तनशील है, तो वह सफलता में विनम्र और असफलता में धैर्यवान बना रह सकता है। यही मानसिक दृढ़ता दीर्घकालीन सफलता की आधारशिला बनती है।
भारतीय दर्शन में संसार को परिवर्तनशील माना गया है। चाणक्य का यह श्लोक उसी व्यापक विचारधारा का व्यावहारिक रूप है। यह हमें याद दिलाता है कि धन, सत्ता और प्रतिष्ठा जीवन के साधन हैं, स्वयं जीवन का उद्देश्य नहीं। इस श्लोक की एक संतुलित व्याख्या आवश्यक है। यदि इसे केवल 'सब कुछ भाग्य से होता है' के रूप में समझा जाए तो यह चाणक्य के व्यापक चिंतन के विपरीत होगा। चाणक्य बार-बार शिक्षा, पुरुषार्थ, नीति और विवेक को सफलता का आधार बताते हैं।
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