
भावार्थ: उपाय करने पर दरिद्रता नहीं रहती, जप करने वाले को पाप नहीं रहता, मौन होने से कलह नहीं होता और जागने वाले के निकट भय नहीं आता।
चाणक्य नीति का यह श्लोक मात्र दो पंक्तियों में जीवन की चार सबसे बड़ी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है- दरिद्रता, पाप, कलह और भय। और यह समाधान किसी देवता की कृपा पर नहीं, किसी भाग्य की प्रतीक्षा पर नहीं, बल्कि मनुष्य के अपने कर्म, अपनी साधना, अपने संयम और अपनी सजगता पर आधारित है। यह श्लोक मनुष्य को परिस्थितियों का दास नहीं, परिस्थितियों का निर्माता बनने का आह्वान करता है। चारों सूत्र स्वतंत्र हैं, किंतु एक साथ वे एक समग्र जीवन-दर्शन का निर्माण करते हैं।
चाणक्य का यह प्रथम सूत्र एक ऐसे समाज को सीधी चुनौती देता है जो दरिद्रता को भाग्य का लेखा मानकर स्वीकार कर लेता है। 'उद्योग' का अर्थ केवल व्यापार या नौकरी नहीं है, इसका मूल अर्थ है 'उद्यम', 'प्रयास', 'सक्रियता'। जो व्यक्ति हाथ पर हाथ धरकर बैठा रहे और भाग्य की प्रतीक्षा करे, वह दरिद्रता का ही वरण करता है। किंतु जो उठकर प्रयास करे, जो अपनी शक्ति और बुद्धि को लगाए, उसके द्वार से दरिद्रता स्वयं हट जाती है।
यहां चाणक्य एक गहरी मनोवैज्ञानिक सच्चाई भी कह रहे हैं। दरिद्रता केवल धन का अभाव नहीं है, वह मानसिक जड़ता का भी परिणाम है। जब मनुष्य यह मान लेता है कि 'मेरे भाग्य में यही लिखा है', तब वह प्रयास करना छोड़ देता है और यही मानसिक दरिद्रता उसकी भौतिक दरिद्रता को स्थायी बना देती है। उद्योग इसी जड़ता को तोड़ता है। आधुनिक अर्थशास्त्र भी यही कहता है- किसी भी राष्ट्र की समृद्धि उसके प्राकृतिक संसाधनों से नहीं, उसके नागरिकों के परिश्रम और उद्यमशीलता से आती है। जापान के पास प्राकृतिक संपदा नगण्य है, किंतु उद्योगशीलता के बल पर वह विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में है। चाणक्य का यह सूत्र राष्ट्र के लिए भी उतना ही सत्य है जितना व्यक्ति के लिए।
'जप' शब्द को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित करना इस सूत्र के साथ न्याय नहीं होगा। जप का गहरा अर्थ है- निरंतर स्मरण, निरंतर चिंतन, निरंतर साधना। जो व्यक्ति नित्य किसी उच्च आदर्श का, किसी नैतिक मूल्य का, किसी दिव्य चेतना का स्मरण करता है, वह धीरे-धीरे उसी के रंग में रंगता जाता है। पाप का मूल है विस्मृति। जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को, अपनी अंतरात्मा की आवाज को भूल जाता है, तभी वह पाप की ओर प्रवृत्त होता है। जप इसी विस्मृति का उपाय है। जो व्यक्ति प्रतिदिन अपने आदर्शों का स्मरण करता है, जो नियमित रूप से आत्मचिंतन करता है, वह पाप की ओर झुकता ही नहीं, क्योंकि उसकी चेतना सदा जागृत रहती है।
आधुनिक मनोविज्ञान में इसे 'Mindfulness' कहते हैं। जो व्यक्ति सजग है, जो अपने विचारों और कर्मों के प्रति जागरूक है, वह आवेश में आकर गलत निर्णय नहीं लेता। जप वह साधना है जो मनुष्य की चेतना को परिष्कृत करती है और उसे नैतिक दृढ़ता देती है।
यह सूत्र देखने में सरल लगता है, किंतु इसकी गहराई असाधारण है। कलह का जन्म कैसे होता है? अनावश्यक वचन से, अपरिपक्व प्रतिक्रिया से, बिना सोचे बोले गए शब्दों से। संसार के अधिकांश झगड़े, अधिकांश युद्ध और अधिकांश टूटे हुए संबंध, वाणी के असंयम के परिणाम हैं। मौन का अर्थ कायरता नहीं है, मौन का अर्थ पराजय नहीं है, मौन का अर्थ है- विवेकपूर्ण संयम। जब कोई अपशब्द कहे और हम मौन रहें, तो हम हारते नहीं, हम उस स्तर पर उतरने से बचते हैं। जब कोई विवाद भड़काने की कोशिश करे और हम मौन रहें, तो हम कमजोर नहीं होते, हम उस अग्नि को ईंधन देने से इनकार करते हैं।
तुलसीदास ने भी कहा, 'तुलसी मीठे वचन ते सुख उपजत चहुं ओर; बसीकरन इक मंत्र है, परिहरू बचन कठोर।' और इससे भी आगे- जहां मीठे वचन संभव न हों, वहां मौन ही श्रेष्ठ है। सामाजिक स्तर पर यदि राजनेता, परिवार के मुखिया और समाज के नेता मौन के इस सूत्र को समझ लें, तो अनगिनत विवाद, अनगिनत विभाजन और अनगिनत द्वेष स्वतः समाप्त हो जाएं।
यह श्लोक का सबसे गहरा और सबसे व्यापक सूत्र है। 'जागरण' के अनेक अर्थ हैं- शारीरिक जागरण, मानसिक सजगता, सामाजिक चेतना और आत्मिक जागृति।
शारीरिक स्तर पर जो व्यक्ति सतर्क है, जो अपने परिवेश के प्रति सजग है, उसे शत्रु या संकट आसानी से नहीं घेर सकता। भय तब आता है जब हम असावधान होते हैं, जब हम अपनी परिस्थिति से अनजान होते हैं।
सामाजिक स्तर पर जो समाज जागरूक है, जो अपने अधिकारों को जानता है, जो शोषण को पहचानता है, जो अन्याय के सामने आंखें खुली रखता है, उसे कोई भी शासक या व्यवस्था आसानी से नहीं दबा सकती। इतिहास साक्षी है कि निद्रित समाजों पर ही दासता थोपी गई है।
आत्मिक स्तर पर गीता में श्रीकृष्ण ने 'स्थितप्रज्ञ' का जो वर्णन किया है, वह जागृत चेतना का ही सर्वोच्च रूप है। जो भीतर से जाग गया, जिसने अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लिया, उसे फिर किसी का भय नहीं रहता।
उद्योग, जप, मौन और जागरण- ये चारों सूत्र मिलकर एक ऐसे मनुष्य का निर्माण करते हैं जो न दरिद्र है, न पापी, न कलहप्रिय, न भयभीत। चाणक्य का यह श्लोक किसी बाह्य शक्ति से सहायता नहीं मांगता, यह मनुष्य को उसकी अपनी शक्ति का स्मरण कराता है। समाधान बाहर नहीं, तुम्हारे भीतर है- उठो, जपो, मौन रहो और जागो। यही चाणक्य का संदेश है, यही उनकी नीति है और यही उनका दर्शन भी।
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