
भावार्थ : शोक संताप करने वाले उत्पन्न बहुपुत्रों से क्या? कुल को सहारा देनेवाला एक ही पुत्र श्रेष्ठ है क्योंकि उससे कुल विश्राम पाता है।
चाणक्य की नीति केवल राजनीति का शास्त्र नहीं है, वह जीवन के उस गहरे सत्य को छूती है जिसे हम प्रायः संख्याओं के मोह में भूल जाते हैं। यह श्लोक उसी मोह पर एक तीखा प्रहार है। भावार्थ सीधा है- ऐसे अनेक पुत्रों से क्या लाभ जो केवल शोक और संताप के कारण बनें? एक ही पुत्र श्रेष्ठ है, यदि वह कुल का आलंब हो, जिस पर टिककर पूरा कुल विश्राम पा सके। किंतु इस सीधे भावार्थ के भीतर एक बहुस्तरीय दार्शनिक दृष्टि छिपी है, जिसे समझे बिना श्लोक का न्याय नहीं होता।
भारतीय समाज में पुत्र-कामना एक गहरी सांस्कृतिक जड़ रखती है। पुत्र से वंश, पुत्र से पितृ-ऋण, पुत्र से कुल-नाम। यह त्रिवेणी सदियों से पुत्र-जन्म को उत्सव बनाती आई है। किंतु चाणक्य यहां प्रश्न उठाते हैं कि जन्म से क्या? उपयोगिता से क्या? वे संख्या की पूजा को अस्वीकार करते हुए गुणवत्ता की प्रतिष्ठा करते हैं।
यह विचार केवल चाणक्य का नहीं। उपनिषदों में भी कहा गया है, 'एकमेवाद्वितीयम्', अर्थात एक ही, जो अद्वितीय हो, वही सत्य है। बहुलता भ्रम उत्पन्न करती है, एकता स्थिरता देती है। चाणक्य इसी उपनिषदीय चिंतन को सामाजिक धरातल पर उतारते हैं।
चाणक्य उन पुत्रों को शोकसन्तापकारक कहते है। ऐसे पुत्र जो शोक और संताप उत्पन्न करने वाले हों। यहां 'शोक' और 'संताप' दो भिन्न अवस्थाएं हैं। शोक वह भावनात्मक अनुभव जो किसी प्रिय की हानि पर होता है। संताप वह मानसिक अनुभव है जो निरंतर जलाता रहता है। अर्थात ऐसे पुत्र न केवल तत्काल दुःख देते हैं, बल्कि दीर्घकालिक व्यथा के स्रोत बनते हैं।
महाभारत में धृतराष्ट्र इसी का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। सौ पुत्रों के पिता, किंतु परिणाम? कुल का नाश, वंश का विनाश, और स्वयं वन में भटकने की नियति। दुर्योधन जैसे पुत्र ने जो 'शोकसंताप' दिया, वह इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी बन गई। चाणक्य मानो इसी से सीख लेकर यह सूत्र रचते हैं।
श्लोक का सबसे महत्त्वपूर्ण पद है- कुलालम्बी। आलंब अर्थात् वह सहारा जिससे कुछ टिका रहे। वृक्ष की जड़ की भांति। दिखती नहीं, किंतु पूरे वृक्ष को थामे रहती है। ऐसा पुत्र जो माता-पिता का सहारा बने, वृद्धों की सेवा करे, परिवार में संकट के समय स्तंभ बनकर खड़ा हो, वही कुलालम्बी है। जहां कुल विश्राम पाता है। यह 'विश्राम' शब्द अत्यंत मार्मिक है। विश्राम तब मिलता है जब भविष्य की चिंता नहीं होती, जब कोई विश्वासपात्र कंधा हो। एक सक्षम, धर्मनिष्ठ संतान का होना, यही परिवार का सर्वोच्च आश्वासन है।
आज जब जनसंख्या नीतियों पर राष्ट्रीय बहस हो रही है, जब 'हम दो, हमारे दो' बनाम 'अधिक संतान' का विमर्श चल रहा है, तब यह श्लोक एक प्राचीन किंतु तीक्ष्ण उत्तर देता है। चाणक्य कहते हैं कि संख्या नहीं, संस्कार मायने रखता है। दस संतानें यदि निकम्मी हों, तो माता-पिता का बुढ़ापा असुरक्षित है। एक संतान यदि सुयोग्य हो, तो वह पूरे कुल का भार वहन करती है।
यह केवल पारिवारिक नीति नहीं, अपितु यह राष्ट्रनीति भी है। एक सशक्त, शिक्षित, नैतिक नागरिक अनेक निरर्थक नागरिकों से अधिक मूल्यवान है। चाणक्य का यह चिंतन आज के मानव-संसाधन प्रबंधन के मूल में भी उतरता है।
चाणक्य की यह उक्ति एक पिता की पीड़ा नहीं, एक नीतिज्ञ का सिद्धांत है कि जीवन में बाहुल्य नहीं, सार्थकता खोजो। जैसे एक दीपक अंधेरे को मिटाने के लिए पर्याप्त है, वैसे ही एक गुणवान संतान पूरे कुल को आलोकित करने में समर्थ है। श्रेष्ठता की संख्या नहीं होती, वह एकत्व में वास करती है।
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