
अभी स्टैंडअप कमीडियन समय रैना काफी चर्चा में हैं। उन्होंने 1990 के दशक में 'कश्मीरी पंडितों' के अपने घर-बार छोड़कर भागने को रणनीतिक रूप से उचित निर्णय बताया। रैना के इस दृष्टिकोण को बहुत से लोग सहमत हैं तो कुछ पंडितों के उस पलायन को कायरता भी बता रहे हैं। इस बहस में चाणक्य नीति हमें एक दिशा दिखा रही है। चाणक्य कहते हैं-
भावार्थ : उपद्रव उठने पर, शत्रु के अचानक आक्रमण करने पर, भयानक अकाल पड़ने पर और दुर्जनों के संग होने पर जो भागता है वह जीता है।
शब्द सरल हैं, पर अर्थ की परतें गहरी हैं। चाणक्य कहते हैं, 'महामारी में, शत्रु के आक्रमण में, दुर्भिक्ष (अकाल) में, भयावह संकट में और दुर्जनों की संगति में जो पलायन कर लेता है, वही जीवित रहता है।' पहली दृष्टि में यह कायरता का उपदेश लगता है। लेकिन चाणक्य कायर नहीं थे, वह यथार्थवादी थे। और यही इस श्लोक की असली धार है।
हमारी सांस्कृतिक स्मृति में पलायन को कलंक की तरह देखा गया है। रण से भागने वाला कायर कहलाता है। लेकिन चाणक्य उस परंपरा से नहीं, नीतिशास्त्र की उस परंपरा से बोलते हैं जो परिणाम को प्रधान मानती है। महाभारत में भी यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में यही प्रश्न उठता है, 'किं स्विदेकं न हन्यते? वह क्या है जो नष्ट नहीं होता?' उत्तर है- विवेक।
पलायन तब पराजय है जब वह भय से जन्मता है। पलायन तब नीति है जब वह विवेक से निर्देशित हो। चाणक्य दूसरी स्थिति की बात कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि उस परिस्थिति को पहचानो जो तुम्हारे वश में नहीं है, और उससे दूर हट जाओ। यही जीवित रहने की कला है।
चाणक्य ने जिन पांच परिस्थितियों का उल्लेख किया है, वे केवल तत्कालीन राजनीतिक यथार्थ नहीं हैं, अपितु वे मानव जीवन के शाश्वत संकट हैं।
उपसर्ग : महामारी या प्राकृतिक आपदा। यहां शत्रु अदृश्य है, इसलिए अधिक घातक। उससे लड़ा नहीं जा सकता, केवल बचा जा सकता है। यही चाणक्य कह रहे हैं, 'वीरता का प्रदर्शन वहां करो जहां वीरता काम आए।'
अन्यचक्र : शत्रु का सैन्य आक्रमण। जब शक्ति असमान हो, तब टकराव आत्मघाती है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र स्वयं कहता है, 'षाड्गुण्यनीति' में सन्धि और आसन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना विग्रह।
दुर्भिक्ष : अकाल। यह केवल भूख की समस्या नहीं, सामाजिक विघटन की स्थिति है। जहां अन्न नहीं, वहां नैतिकता भी संकुचित हो जाती है। ऐसे में स्थान-परिवर्तन जीवन-रक्षा है।
भयावह : अनिश्चित, व्यापक भय की स्थिति। यह मनोवैज्ञानिक संकट है। दीर्घकालीन भय मनुष्य के विवेक को क्षीण कर देता है। इससे दूरी आवश्यक है।
असाधुजनसंपर्क : और यहीं चाणक्य सबसे क्रांतिकारी बात कहते हैं। पहले चार संकट बाह्य हैं। प्रकृति, शत्रु, अकाल, भय। पांचवां मानवनिर्मित है। दुर्जनों की संगति। यह सूची में अंतिम है, लेकिन शायद सबसे दीर्घकालीन विष है।
चाणक्य जानते थे कि बाह्य संकट अस्थायी होते हैं। महामारी जाती है, आक्रमण रुकते हैं, अकाल समाप्त होता है। लेकिन दुर्जन की संगति एक धीमी, अदृश्य प्रक्रिया है जो व्यक्ति के चरित्र को भीतर से खोखला कर देती है। इसीलिए उन्होंने इसे उसी श्रेणी में रखा जिसमें जीवन के सबसे भयावह संकट हैं। आज के संदर्भ में यह और भी स्पष्ट है। संस्थाएं, कार्यस्थल, सामाजिक वृत्त, जहां असाधु प्रवृत्तियां प्रभावी हों, वहां टिके रहना नैतिक साहस नहीं, आत्म-विनाश है। चाणक्य उस मोह को तोड़ने की बात करते हैं जो हमें उन स्थानों और संबंधों से बांधे रखता है जो हमें नष्ट कर रहे हैं।
कुछ आलोचक कह सकते हैं कि इस तरह समाज को छोड़कर भाग जाना तो स्वार्थ है। लेकिन चाणक्य का तर्क गहरा है। जो नष्ट हो गया, वह समाज की सेवा नहीं कर सकता। जीवित व्यक्ति ही पुनर्निर्माण करता है। इसीलिए उनका दर्शन यह है कि पहले बचो, फिर बनाओ। यह वही तर्क है जो आधुनिक आपदा प्रबंधन में दिया जाता है। विमान में पहले अपना ऑक्सीजन मास्क लगाओ, फिर दूसरे की मदद करो। चाणक्य ने यह बात सैकड़ों साल पहले कह दी थी।
यह श्लोक अंततः एक ही संदेश देता है कि परिस्थिति की पहचान करना और उसके अनुसार निर्णय लेना, यही सच्चा पराक्रम है। अहंकारवश असंभव से टकराते रहना वीरता नहीं, मूर्खता है। जो जीवित है, वही इतिहास बनाता है। चाणक्य का यह श्लोक किसी कायर के लिए नहीं लिखा गया। यह उस विवेकशील मनुष्य के लिए है जो जानता है कि कब लड़ना है और कब सिर्फ बच निकलना। समय रैना ने ठीक यही कहा कि कश्मीरी पंडितों ने विवेक का आसरा लेकर रणनीति का परिचय दिया था।
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