आज का सुविचार : दुर्जन और सर्प में सांप अच्छा, दुर्जन नहीं क्योंकि...

Quote of the day : चाणक्य ने इस श्लोक में केवल चेतावनी नहीं दी, उन्होंने विवेकशील समाज की नींव रखी। वह समाज जो दिखावे पर नहीं, आचरण पर दृष्टि रखे। जो मित्र और शत्रु का भेद उनके वचनों से नहीं, उनके पग पग के व्यवहार से करे।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड3 Apr 2026, 08:11 AM IST
चाणक्य नीति से आज का सुविचार
चाणक्य नीति से आज का सुविचार

चाणक्य नीति श्लोक

दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः।

सर्पो दशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे ॥

भावार्थ : दुर्जन और सर्प में सांप अच्छा है, दुर्जन नहीं। क्योंकि सांप काल आने पर काटता है दुर्जन हर समय।

भय के दो साधन

चाणक्य ने यह श्लोक लिखते समय कोई काव्य-चमत्कार नहीं रचा था। उन्होंने एक ऐसी सच्चाई को शब्द दिए, जो हर युग के हर समाज में उतनी ही तीखी और उतनी ही प्रासंगिक रही है। सर्प और दुर्जन, दोनों भय के प्रतीक हैं। दोनों पीड़ा देते हैं। किन्तु चाणक्य कहते हैं कि यदि चुनना पड़े, तो सर्प को चुनो। यह केवल व्यावहारिक बुद्धि की बात नहीं है। इसके भीतर एक गहरी दार्शनिक दृष्टि छिपी है।

क्रूरता : पारदर्शिता बनाम षडयंत्र

श्लोक का शाब्दिक अर्थ सरल है। सर्प और दुर्जन में से सर्प श्रेष्ठ है, क्योंकि सर्प तो किसी विशेष क्षण में ही डसता है, जबकि दुर्जन पग-पग पर आघात करता है। किन्तु इस सरल वाक्य में जो गहराई है, वह चाणक्य की राजनीतिक-सामाजिक अंतर्दृष्टि का सार है।

सर्प एक प्राकृतिक प्राणी है। उसकी हिंसा में स्वभाव है, स्वार्थ नहीं। वह भयभीत होने पर डसता है, भूखा होने पर आक्रमण करता है। उसकी क्रूरता में एक पारदर्शिता है। जब वह सामने आए, मनुष्य सावधान हो सकता है। किन्तु दुर्जन? दुर्जन मुस्कुराते हुए घाव देता है। वह मित्र के वेश में शत्रु होता है, शुभचिंतक के मुखौटे में षड्यंत्रकारी।

प्रकृति बनाम विकृति

भारतीय दर्शन में स्वभाव और विभाव का भेद मौलिक है। सर्प का डसना उसका स्वभाव है। उसमें कोई नैतिक दोष नहीं। वह तमस से संचालित है, किन्तु उस तमस में कोई छल नहीं। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, 'स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा', अर्थात प्राणी अपने स्वभाव से बंधे हैं। सर्प का स्वभाव निश्चित है, पूर्वानुमेय है।

दुर्जन का दुर्जनत्व इससे भिन्न है। वह विकृति है। स्वभाव का नहीं, संस्कार का पतन है। वेदांत की भाषा में कहें तो दुर्जन वह है जिसमें अहंकार और ईर्ष्या ने विवेक को आच्छादित कर दिया है। वह जानते हुए भी अनिष्ट करता है। और यही उसे सर्प से अधिक खतरनाक बनाता है। पदे पदे। यह दो शब्द चाणक्य की पूरी सामाजिक समझ हैं। दुर्जन की हिंसा में कोई विराम नहीं, कोई ऋतु नहीं, कोई सीमा नहीं।

संस्था, सत्ता और संबंध के सूत्र

चाणक्य के समय में यह श्लोक राजनीतिक परामर्श था। राजा को बताया जा रहा था कि दरबार में बैठा चापलूस और षड्यंत्रकारी, जंगल के सर्प से अधिक घातक है। किन्तु आज इस श्लोक की परिधि बहुत विस्तृत है। आधुनिक समाज में दुर्जन के अनेक रूप हैं। वह कार्यालय में वह सहकर्मी हो सकता है जो पीठ पीछे अपयश फैलाए।

वह सार्वजनिक जीवन में वह नेता हो सकता है जो वाणी में मधु और आचरण में विष रखे। वह परिवार में भी हो सकता है, जो स्नेह का अभिनय करते हुए हित नष्ट करे। पदे पदे का अर्थ यह है कि ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति में कोई भी क्षण निरापद नहीं रहता।

सर्प से बचाव संभव है। उसकी भंगिमा पहचानी जा सकती है, उसका आवास जाना जा सकता है। किन्तु दुर्जन अपना विष विश्वास के आवरण में परोसता है। इसीलिए चाणक्य ने अर्थशास्त्र में स्पष्ट किया है कि राज्य की सबसे बड़ी कमजोरी बाहरी शत्रु नहीं, भीतरी दुर्जन होता है।

आज के दुर्जनों की पहचान

सूचना-युग में यह श्लोक और भी प्रखर हो उठता है। एक सर्प एक व्यक्ति को डस सकता है। किन्तु एक दुर्जन के हाथ में सोशल मीडिया, संस्था या सत्ता हो तो वह पग पग लाखों को क्षति पहुंचा सकता है।

अफवाह, द्वेष, और छल, ये आधुनिक दुर्जन के अस्त्र हैं। चाणक्य का यह श्लोक हमें एक व्यावहारिक धर्म सिखाता है- सतर्कता। न भय से, न घृणा से, बल्कि विवेक से। दुर्जन की पहचान उसके कर्म से होती है, वाणी से नहीं। जो पदे पदे आहत करे, उससे दूरी ही सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता है।

असतो मा सद्गमय…

जैसा उपनिषद् कहते हैं, 'असतो मा सद्गमय'। असत् से सत् की ओर बढ़ना जीवन का लक्ष्य है। और उस यात्रा में दुर्जन की संगति से बचना, सर्प के डर से भागने से कहीं अधिक आवश्यक है।

आज का सुविचार और आज की कथा पढ़ने के लिए क्लिक करें।

Get Latest real-time updates

Catch all the Business News, Market News, Breaking News Events and Latest News Updates on Live Mint. Download The Mint News App to get Daily Market Updates.

होमट्रेंड्सआज का सुविचार : दुर्जन और सर्प में सांप अच्छा, दुर्जन नहीं क्योंकि...
More