
भावार्थ: वह माता शत्रु और पिता बैरी है जिसने अपने बालक को न पढ़ाया। अनपढ़ लोग पढ़े-लिखों की सभा में उसी तरह से अशोभनीय होते हैं, जैसे हंसों की सभा में कोई बगुला।
चाणक्य नीति का यह श्लोक अपनी भाषा में जितना कठोर है, अपने भाव में उतना ही करुणामय। जो माता-पिता अपने बच्चे को शिक्षा नहीं देते, उन्हें 'शत्रु' और 'वैरी' कहना निंदा नहीं, एक गहरी चेतावनी है। चाणक्य यहां माता-पिता की प्रतिष्ठा पर उंगली नहीं उठा रहे, वे उन्हें उस उत्तरदायित्व का बोध करा रहे हैं जो संतान को जन्म देने के साथ ही उनके कंधों पर आ जाता है। और हंस-बगुले का रूपक इस सत्य को इतनी सुंदरता और इतनी तीक्ष्णता से प्रस्तुत करता है कि यह श्लोक सदियों बाद भी उतना ही प्रासंगिक बना हुआ है।
भारतीय परंपरा में माता को प्रथम गुरु कहा गया है- 'माता प्रथमो गुरुः।' जो माता प्रथम गुरु है, यदि वही शिक्षा से विमुख रहे तो संतान का क्या होगा? चाणक्य इसी विरोधाभास को 'शत्रु' शब्द से उजागर करते हैं। शत्रु वह होता है जो हमारी उन्नति में बाधा डाले, जो हमारे भविष्य को अंधकारमय बनाए। यदि माता-पिता अपनी संतान को शिक्षा से वंचित रखते हैं- चाहे अज्ञानवश, चाहे लापरवाही से, चाहे आर्थिक कारणों की आड़ में, तो वे अनजाने में ही अपने बच्चे के सबसे बड़े शत्रु बन जाते हैं।
यहां एक सूक्ष्म किंतु महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि चाणक्य केवल विद्यालयी शिक्षा की बात नहीं कर रहे। 'पाठित' शब्द व्यापक है- इसमें अक्षरज्ञान के साथ-साथ संस्कार, नैतिकता, व्यवहारकुशलता और जीवनदृष्टि का निर्माण भी समाहित है। एक बच्चे को केवल पुस्तकें पढ़ा देना पर्याप्त नहीं, उसे यह भी सिखाना होगा कि सत्य क्या है, न्याय क्या है, कर्तव्य क्या है और जीवन का उद्देश्य क्या है। यही समग्र शिक्षा है और यही माता-पिता का वास्तविक दायित्व है।
चाणक्य का हंस-बगुले का रूपक भारतीय साहित्य के सर्वाधिक प्रभावशाली रूपकों में से एक है। हंस और बगुला, दोनों श्वेत हैं, दोनों पक्षी हैं, दोनों जल के समीप रहते हैं, फिर भी दोनों में आकाश-पाताल का अंतर है। हंस विवेक का प्रतीक है, वह नीर-क्षीर विवेक रखता है, अर्थात् दूध और पानी को अलग करने की क्षमता रखता है। वह सुंदर है, गरिमामय है, उसकी चाल में एक विशेष लय है। बगुला दिखने में भले ही हंस जैसा लगे, किंतु उसकी प्रकृति अवसरवादी है, उसका ध्यान केवल शिकार पर है, उसकी उपस्थिति में हंस की सभा की गरिमा नष्ट होती है।
यहां चाणक्य का आशय यह नहीं कि अशिक्षित व्यक्ति बगुले की भांति हीन है, बल्कि यह है कि बिना शिक्षा के मनुष्य उस परिवेश में असहज और अप्रासंगिक हो जाता है जहां विद्या, विवेक और वाक्पटुता की मांग हो। वह चाहे कितना भी सज्जन क्यों न हो, कितना भी परिश्रमी क्यों न हो, यदि उसके पास ज्ञान का अभाव है, तो वह उस सभा में योगदान नहीं दे पाएगा, अपनी बात नहीं रख पाएगा, अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाएगा।
चाणक्य का यह श्लोक सामाजिक न्याय के एक मूलभूत सत्य को भी उजागर करता है। जन्म से कोई हंस नहीं होता और कोई बगुला नहीं। यह शिक्षा है जो मनुष्य को उसकी पूर्ण क्षमता तक पहुंचाती है। जिस समाज में शिक्षा का अभाव है, वहां व्यक्ति अपनी क्षमताओं के बावजूद उपेक्षित रहता है। शिक्षा वह साधन है जो जन्म की असमानताओं को पाटती है, जो साधारण परिवार के बच्चे को असाधारण ऊंचाई तक पहुंचा सकती है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर का जीवन इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। एक ऐसे समाज में जहां उनके लिए हर द्वार बंद था, शिक्षा ही वह एकमात्र द्वार था जो खुला। और उसी द्वार से होकर वे इतने विराट बने कि हंसों की सभा में केवल पहुंचे नहीं, हंसों के समाज का निर्माण ही कर गए। चाणक्य का यह श्लोक उसी शिक्षा की अपरिहार्यता को रेखांकित करता है।
आज के युग में यह श्लोक एक नए आयाम में प्रासंगिक है। कुछ माता-पिता आर्थिक कारणों से बच्चों को शिक्षा नहीं दे पाते, यह एक सामाजिक समस्या है जिसे समाज और राज्य मिलकर सुलझाएं। किंतु कुछ माता-पिता सामर्थ्य होते हुए भी बच्चों की शिक्षा के प्रति उदासीन रहते हैं और यहीं चाणक्य का 'शत्रु' शब्द सबसे तीखा वार करता है।
इससे भी आगे आज 'शिक्षा' की परिभाषा बदल गई है। केवल डिग्री लेना शिक्षा नहीं। बच्चे को केवल इंजीनियर या डॉक्टर बनाना माता-पिता का पूर्ण दायित्व नहीं। उसे एक अच्छा मनुष्य बनाना, उसमें सहानुभूति, नैतिकता, साहस और विवेक के संस्कार डालना, यही वास्तविक 'पाठित' करना है। जो माता-पिता बच्चे को परीक्षा में अव्वल तो लाते हैं, किंतु जीवन की सभा में असहज छोड़ देते हैं, वे भी चाणक्य के इस श्लोक के दायरे में आते हैं।
चाणक्य का यह श्लोक अंततः यह सिद्ध करता है कि शिक्षा कोई विकल्प नहीं, यह प्रत्येक माता-पिता का, प्रत्येक समाज का और प्रत्येक राष्ट्र का नैतिक दायित्व है। एक शिक्षित संतान केवल एक परिवार की नहीं, पूरे समाज की संपत्ति है। और एक अशिक्षित पीढ़ी केवल एक परिवार की नहीं, पूरे राष्ट्र की क्षति है। हंसों की सभा में हंस चाहिए और हंस जन्म से नहीं बनते, शिक्षा से बनते हैं। यही चाणक्य का संदेश है, यही उनकी चेतावनी है और यही उनकी करुणा भी।
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