
भावार्थ: यह मेरा है, वह पराया- ऐसी गणना छोटे मन वाले करते हैं। उदार चरित्र वालों के लिए तो सारी वसुधा ही एक परिवार है।
भारत के उत्सव केवल मनोरंजन के लिए नहीं रचे गए, वे जीवन-दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम हैं। जो बात उपनिषद् के श्लोकों में कही गई, जो बात वेदांत के ग्रंथों में लिखी गई, उसे सामान्य मनुष्य के जीवन में उतारने का काम इन उत्सवों ने किया। होली उन्हीं उत्सवों में सर्वाधिक जीवंत, सर्वाधिक समावेशी और सर्वाधिक दार्शनिक पर्व है। यह केवल रंगों का उत्सव नहीं है, यह भारतीय चिंतन के उस सर्वोच्च सूत्र का वार्षिक उत्सव है जो कहता है- सारी वसुधा एक परिवार है।
वर्ष के अन्य दिनों में मनुष्य जाति, धर्म, वर्ग, पद और भाषा के रंगों में बंटा रहता है, किंतु होली के दिन एक ही रंग सबको एक कर देता है। जो गुलाल किसी श्रमिक के गाल पर लगता है, वही किसी संपन्न के माथे पर भी। जो अबीर किसी वृद्ध के हाथ में है, वही किसी बालक के हाथ में भी। यह समानता किसी संविधान ने नहीं थोपी, किसी कानून ने नहीं बनाई अपितु यह उत्सव की आत्मा से स्वतः उत्पन्न होती है। और यही इस पर्व की सबसे बड़ी शक्ति है।
होली का पहला और सबसे गहरा पक्ष है- होलिका दहन। हिरण्यकशिपु का असीमित अहंकार, होलिका की कुटिल चालाकी और उनके विरुद्ध बालक प्रह्लाद की अटूट, निर्भय आस्था। यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, यह हर मनुष्य के भीतर प्रतिक्षण चलने वाले संघर्ष का प्रतीक है।
हिरण्यकशिपु हमारे भीतर का वह अहंकार है जो कहता है- 'मैं ही सर्वोच्च हूं, मेरे अतिरिक्त कोई सत्य नहीं, मेरी इच्छा ही नियम है।' यह अहंकार जब परिवार में होता है तो संबंध टूटते हैं, जब समाज में होता है तो वर्ग-संघर्ष जन्म लेता है, और जब राष्ट्रों में होता है तो युद्ध होते हैं।
होलिका वह कुटिल बुद्धि है जो सत्य को, प्रेम को, निष्कपटता को नष्ट करने की योजना बनाती है और यह भी विश्वास करती है कि उसके पास एक 'सुरक्षा कवच' है जो उसे बचा लेगा। किंतु जब कोई कुकर्म करने बैठता है, तो उसका अपना कवच भी काम नहीं आता। और प्रह्लाद वह सरल, निष्कपट, निर्भय प्रेम का प्रतीक है जो किसी शस्त्र के बिना, किसी कवच के बिना, केवल अपनी आस्था के बल पर विजयी होता है।
होलिका दहन हमें यह संदेश देता है कि प्रत्येक वर्ष एक बार रुककर अपने भीतर के अहंकार को, अपनी कुटिलता को, अपनी संकीर्णता को और अपने पुराने द्वेषों को अग्नि में समर्पित करो। जो बीत गया उसकी राख को मत थामे रहो, उसे जलाओ और नए सिरे से जीवन प्रारंभ करो। यही वास्तविक होलिका दहन है- बाहर का नहीं, भीतर का।
आज जब हम रंग खेलेंगे, तब समाज की वे सभी दीवारें एक क्षण के लिए ढह जाएंगी जो वर्ष भर अपराजेय बनी रहती हैं। ऊंच-नीच, अमीर-गरीब, परिचित-अपरिचित, सब एक ही रंग में रंग जाते हैं। रंग किसी का परिचय नहीं मांगता, किसी की जाति नहीं पूछता, किसी की आय नहीं देखता, वह बस लग जाता है, और जिस पर लगता है उसे अपना बना लेता है।
यह वसुधैव कुटुम्बकम् का व्यावहारिक उत्सव है। महोपनिषद् का यह श्लोक जो दर्शन के ग्रंथों में लिखा है, होली उसे जीवन के चौक-चौराहों पर, गलियों में और आंगनों में जीकर दिखाती है। यही भारतीय संस्कृति की विलक्षणता है। उसने अपने दर्शन को केवल पुस्तकों में नहीं, उत्सवों में, परंपराओं में और दैनिक जीवन में बुन दिया।
आज के युग में जब समाज पहचान, धर्म, विचारधारा और राजनीति के नाम पर तेजी से बंटता जा रहा है, होली का यह रंग और भी अधिक आवश्यक हो गया है। जिस दिन हम केवल उत्सव के लिए नहीं, बल्कि इस भावना को हृदय में धारण करके रंग लगाएं, उस दिन होली का वास्तविक अर्थ सिद्ध होगा।
होली वसंत ऋतु का उत्सव भी है। और वसंत प्रकृति का सबसे आशावादी संदेश है। शीत ऋतु की लंबी, ठंडी, उदास रातों के बाद जब पेड़ों पर नई कोंपलें फूटती हैं, जब सरसों के खेत पीले हो जाते हैं, जब टेसू के फूल जंगल को लाल कर देते हैं, तब प्रकृति यह घोषणा करती है कि कोई भी शीत स्थायी नहीं है, कोई भी अंधेरा अंतिम नहीं है।
यह संदेश मनुष्य के जीवन के लिए भी उतना ही सत्य है। जीवन में कितनी भी कठिन परिस्थितियां आएं, कितने भी संबंध टूटें, कितनी भी निराशाएं घेरें, वसंत का आगमन यह विश्वास दिलाता है कि नई शुरुआत सदा संभव है। होली इसीलिए फाल्गुन में मनाई जाती है- यह ऋतु-परिवर्तन का उत्सव है, जड़ता से गति की ओर, निराशा से उमंग की ओर, पुराने से नए की ओर संक्रमण का उत्सव है।
होली का एक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण आयाम है- बृज की होली, राधा और कृष्ण की होली। भारतीय भक्ति परंपरा में राधा-कृष्ण का प्रेम केवल प्रणय-कथा नहीं है, वह जीव और ब्रह्म के मिलन का प्रतीक है। जब कृष्ण राधा पर रंग डालते हैं, तो यह केवल क्रीड़ा नहीं है, यह उस अद्वैत की अनुभूति है जिसमें 'मैं' और 'तुम' का भेद मिट जाता है और केवल एक ही रंग, एक ही प्रेम शेष रहता है।
सूरदास ने इसी भाव को अपने पदों में अभिव्यक्त किया है। जब सब एक ही रंग में रंग जाते हैं, तो कोई ऊंचा नहीं, कोई नीचा नहीं, कोई पराया नहीं। प्रेम की यही परिणति है और होली प्रेम का ही उत्सव है। इसीलिए होली को 'प्रेम का पर्व' भी कहा गया है।
किंतु एक कटु सत्य भी स्वीकार करना होगा। आज होली अपने मूल दर्शन से धीरे-धीरे दूर होती जा रही है। रंग की जगह रासायनिक पदार्थों ने ले ली है जो त्वचा और आंखों को हानि पहुंचाते हैं। उत्सव की मर्यादा कहीं-कहीं अश्लीलता और उच्छृंखलता में बदल जाती है। जो पर्व भेद मिटाने के लिए था, वह कभी-कभी नए भेद और विवाद पैदा कर देता है।
यह विचारणीय है कि क्या हम होली मनाते हैं या केवल होली खेलते हैं? मनाना और खेलना में अंतर है। खेलना बाहरी क्रिया है, मनाना भीतरी अनुभव है। जब तक होली केवल बाहरी रंगों तक सीमित रहेगी और भीतर के अहंकार, द्वेष और संकीर्णता को नहीं जलाएगी, तब तक वह पूर्ण नहीं होगी।
आज होली के इस पावन पर्व पर यही संकल्प उचित है- संकीर्णता जलाओ, नया रंग लगाओ। किसी से पुरानी मनमुटाव हो, आज मिटाओ। किसी को अपने से दूर माना हो, आज अपनाओ। किसी के साथ वर्षों से मौन हो, आज बोलो। क्योंकि जब तक हम 'निज' और 'पर' की गणना करते रहेंगे, जब तक 'यह मेरा है, वह पराया है' की दीवारें खड़ी रहेंगी, तब तक होली खेलेंगे, पर होली के रंग को जी नहीं पाएंगे।
वसुधैव कुटुम्बकम्- यह केवल एक श्लोक नहीं है। होली के दिन यह एक जीवंत सत्य बन जाता है। बस आवश्यकता है तो इस सत्य को एक दिन से निकालकर पूरे वर्ष के जीवन में उतारने की।
🎨 होली की हार्दिक शुभकामनाएं 🎨
रंग लाए प्रेम, उमंग लाए मेल, यही है जीवन की असली होली का खेल।
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