
भावार्थ : किस काल में क्या करना चाहिये, मित्र कौन है, देश कौन है, लाभव्यय क्या है, किसका मैं हूं, मुझमें क्या शक्ति है- ये सब बार-बार विचारने योग्य है।
चाणक्य नीति का यह श्लोक भारतीय नीति-साहित्य का सबसे व्यावहारिक और सबसे गहरा आत्मचिंतन-सूत्र है। यह श्लोक न कोई आदर्श प्रस्तुत करता है, न कोई नैतिक उपदेश देता है। यह केवल छः प्रश्न पूछता है और कहता है- इन्हें बार-बार पूछो, मुहुर्मुहुः विचार करो। जो व्यक्ति इन छः प्रश्नों का उत्तर अपने भीतर ढूंढता रहता है, वह जीवन में कभी दिशाहीन नहीं होता। और जो इन्हें पूछना भूल जाता है, वह चाहे कितना भी परिश्रमी हो, गलत दिशा में दौड़ता रहता है।
चाणक्य ने 'काल' को सर्वप्रथम रखा और यह सर्वथा उचित है। क्योंकि सही कार्य भी यदि गलत समय पर किया जाए तो निष्फल हो जाता है। बीज सही हो, मिट्टी सही हो किंतु यदि मौसम गलत हो, तो फसल नहीं होगी।
'कः कालः' का अर्थ केवल घड़ी देखना नहीं है बल्कि यह पूछना है कि अभी परिस्थिति क्या है? अभी समाज किस दिशा में जा रहा है? अभी मेरे जीवन का कौन सा चरण है? क्या यह उद्यम का समय है या धैर्य का? क्या यह बोलने का अवसर है या मौन का?
महाभारत में भीष्म ने शरशय्या पर कहा कि समय की पहचान ही सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता है। चाणक्य स्वयं इसके जीवंत उदाहरण थे। उन्होंने चंद्रगुप्त को तभी खड़ा किया जब नंद वंश के विरुद्ध जनाक्रोश चरम पर था। समय की पहचान न हो तो सबसे बड़ी शक्ति भी व्यर्थ हो जाती है।
यह प्रश्न जितना सरल दिखता है, उतना ही कठिन है। मित्र और शत्रु सदा स्पष्ट नहीं होते। कभी-कभी जो मित्र दिखते हैं वे स्वार्थी होते हैं, और जो कटु सत्य कहते हैं वे वास्तविक हितैषी होते हैं।
चाणक्य का यह प्रश्न बार-बार पूछने का कारण यह है कि मित्रता स्थिर नहीं रहती, परिस्थितियां बदलती हैं, स्वार्थ बदलते हैं और लोग बदलते हैं। जो कल मित्र था, वह आज तटस्थ हो सकता है और जो कल शत्रु था, वह आज सहयोगी हो सकता है। इसलिए अपने मित्र-मंडल की नियमित समीक्षा करना विवेक का लक्षण है, संदेह का नहीं। सामाजिक दृष्टि से यह प्रश्न राष्ट्रों पर भी लागू होता है। कूटनीति में कोई स्थायी मित्र नहीं होता, केवल स्थायी हित होते हैं। चाणक्य यही सिखाते थे।
देश का अर्थ केवल भौगोलिक स्थान नहीं, इसका अर्थ है परिवेश, वातावरण, वह क्षेत्र जिसमें मैं कार्य कर रहा हूं। क्या यह स्थान मेरी प्रतिभा के अनुकूल है? क्या इस परिवेश में मेरी क्षमता का उचित उपयोग हो सकता है? चाणक्य के पूर्व के श्लोक में हमने पढ़ा था, यस्मिन् देशे न सम्मानः। यानी, जहां सम्मान न हो, वहां नहीं रहना चाहिए। यह सूत्र उसी का विस्तार है। स्थान का चुनाव जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णयों में से एक है। गलत स्थान पर सही व्यक्ति भी मुरझा जाता है, जैसे उपजाऊ बीज बंजर भूमि में।
यह प्रश्न आर्थिक भी है और जीवन-दर्शन भी। 'व्ययागमौ' अर्थात् क्या खर्च हो रहा है और क्या मिल रहा है। यह केवल धन का हिसाब नहीं, समय का, ऊर्जा का, संबंधों का और मूल्यों का भी हिसाब है।
किसी भी कार्य में लगने से पहले पूछो कि इसमें क्या लगाना होगा और क्या मिलेगा? क्या यह सौदा उचित है? कभी-कभी अल्पकालिक व्यय दीर्घकालिक लाभ देता है और कभी-कभी अल्पकालिक लाभ के पीछे दीर्घकालिक क्षति छिपी होती है। इस विवेक को बार-बार जांचते रहना आवश्यक है। आधुनिक प्रबंधन में इसे 'Cost-Benefit Analysis' कहते हैं। किंतु चाणक्य इसे केवल व्यापार तक सीमित नहीं रखते, वे इसे जीवन के हर निर्णय पर लागू करते हैं।
यह श्लोक का सबसे दार्शनिक और सबसे आत्मिक प्रश्न है। मैं किसका हूं? — इसके कई स्तर हैं। व्यावहारिक स्तर पर: मेरी निष्ठा किसके प्रति है? मेरा दायित्व किसके प्रति है? परिवार के प्रति, समाज के प्रति, राष्ट्र के प्रति? क्या मैं उस निष्ठा का निर्वाह कर रहा हूं? दार्शनिक स्तर पर: यह प्रश्न अद्वैत वेदांत के 'कोऽहम्' से जुड़ता है। जब व्यक्ति पूछता है कि 'मैं किसका हूँ?' तो वह अपनी पहचान, अपने संबंध और अपने उद्देश्य को जांचता है। यह आत्मपरीक्षण का सबसे गहरा स्वरूप है। फिर, सामाजिक दृष्टि से यह प्रश्न उत्तरदायित्व का प्रश्न है। जो व्यक्ति यह जानता है कि वह किसका है, परिवार का, समाज का, राष्ट्र का तो वह अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होता।
यह अंतिम और सबसे व्यावहारिक प्रश्न है। अपनी सामर्थ्य को जानना। यह न अहंकार है, न आत्मप्रशंसा। यह आत्मज्ञान है। जो अपनी शक्ति नहीं जानता, वह या तो अपनी क्षमता से कम पर संतुष्ट हो जाता है या अपने सामर्थ्य से अधिक का बोझ उठाकर टूट जाता है। 'का च मे शक्तिः' में 'च' शब्द भी महत्त्वपूर्ण है। इसका तात्पर्य है कि शक्ति के साथ-साथ सीमाओं को भी जानो। जो अपनी सीमाएं नहीं जानता, वह रावण की तरह अपने ही अहंकार में नष्ट होता है।
इस श्लोक की सबसे बड़ी विशेषता अंत में है- मुहुर्मुहुः यानी बार-बार। ये प्रश्न एक बार पूछकर भूल जाने के लिए नहीं हैं। जीवन गतिशील है, काल बदलता है, मित्र बदलते हैं, परिस्थितियां बदलती हैं और हम स्वयं भी बदलते हैं। इसलिए इन प्रश्नों की आवृत्ति आवश्यक है।
चाणक्य का यह षट्प्रश्न सूत्र वस्तुतः एक सम्पूर्ण जीवन-प्रबंधन प्रणाली है। समय की पहचान, सही मित्र, उचित स्थान, विवेकपूर्ण अर्थनीति, स्पष्ट उत्तरदायित्व और आत्मज्ञान- इन छः को जो बार-बार जांचता रहे, वह कभी दिशाहीन नहीं होगा। यही चाणक्य का सर्वोच्च संदेश है- बाहर की दुनिया को बदलने से पहले, बार-बार भीतर झांको।
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