
भावार्थ: जहां मूर्ख नहीं पूजे जाते, जहां अन्न संचित रहता है और जहां स्त्री-पुरुष में कलह नहीं होता, वहां आप ही लक्ष्मी बिराजमान रहती हैं।
चाणक्य नीति का यह श्लोक अत्यंत संक्षिप्त किंतु असाधारण रूप से गहरा है। लक्ष्मी अर्थात् समृद्धि को प्रायः पूजा-अर्चना, भाग्य या दैवीय कृपा से जोड़ा जाता है। किंतु चाणक्य यहां एक सर्वथा भिन्न और यथार्थवादी दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि लक्ष्मी को बुलाना नहीं पड़ता, जहां तीन विशेष परिस्थितियां होती हैं, वहां वह स्वयं चली आती हैं। ये तीन परिस्थितियां हैं- मूर्खों की पूजा नहीं, अन्न का संचयन और दाम्पत्य में कलह का अभाव। यह तीनों सूत्र मिलकर एक स्वस्थ, समृद्ध और सुखी समाज का प्रारूप तैयार करते हैं।
यह श्लोक का सबसे तीखा और सबसे साहसिक सूत्र है। चाणक्य यहां केवल यह नहीं कह रहे कि मूर्खों का सम्मान मत करो, वह कह रहे हैं कि जो समाज या परिवार मूर्खों को पूजता है, वहां से लक्ष्मी स्वयं चली जाती है।
मूर्ख का अर्थ केवल अज्ञानी नहीं है। चाणक्य के संदर्भ में मूर्ख वह है जो अविवेकी है, जो परिणामों की चिंता किए बिना निर्णय लेता है, जो अपनी सीमाओं को नहीं जानता और जिसे अपनी अयोग्यता का बोध नहीं है। ऐसे व्यक्ति जब किसी परिवार में, संस्था में या समाज में निर्णय-निर्माता बन जाते हैं, तो विनाश अनिवार्य है।
इतिहास इसका साक्षी है। जब-जब अयोग्य और मूर्ख लोगों को केवल वंश, चापलूसी या धन के बल पर महत्त्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया, तब-तब उन राज्यों और संस्थाओं का पतन हुआ। और जब-जब योग्यता को सम्मान मिला, तब-तब समृद्धि स्वाभाविक रूप से आई।
आज के संदर्भ में यह सूत्र और भी प्रासंगिक है। लोकतंत्र में जब जनता अविवेकी, भ्रष्ट और अयोग्य नेताओं को बार-बार चुनकर पूजती है, तो राष्ट्र की समृद्धि क्षीण होती है। परिवार में जब सबसे मुखर किंतु सबसे अविवेकी सदस्य की बात मानी जाती है, तो परिवार की उन्नति रुक जाती है। योग्यता को सम्मान देना और अयोग्यता को उसकी सीमा में रखना, यही समृद्धि का प्रथम द्वार है।
धान्यं सुसंचितम्। यह केवल अनाज के भंडारण की बात नहीं है। यह संसाधनों के विवेकपूर्ण संरक्षण और प्रबंधन का दर्शन है। चाणक्य यहां एक गहरा आर्थिक सत्य कह रहे हैं कि जो परिवार या समाज अपने संसाधनों को संजोकर रखता है, आवश्यकता से अधिक व्यय नहीं करता और भविष्य के लिए संचय करता है, वहां समृद्धि स्थायी होती है।
भारतीय ग्रामीण परंपरा में अन्न का संचय केवल आर्थिक कार्य नहीं था, वह एक सांस्कृतिक मूल्य था। घर में भरा हुआ अन्न-भंडार परिवार की सुरक्षा, आतिथ्य की क्षमता और भविष्य की तैयारी का प्रतीक था। जहां अन्न था, वहां लक्ष्मी थी। यह केवल धार्मिक विश्वास नहीं, एक यथार्थ आर्थिक सत्य था।
आधुनिक अर्थशास्त्र में इसे 'बचत एवं निवेश' का सिद्धांत कहते हैं। जो परिवार अपनी आय का एक भाग नियमित रूप से बचाता है, जो राष्ट्र अपने संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करता है, वह संकट के समय भी स्थिर रहता है। और जो सब कुछ आते ही व्यय कर देता है, जो दिखावे और तात्कालिक सुख के लिए भविष्य को दांव पर लगाता है, वहां से लक्ष्मी शीघ्र विदा हो जाती हैं।
चाणक्य का सुसंचितम् शब्द भी विशेष है, केवल संचितम् नहीं, सुसंचितम् अर्थात् सुव्यवस्थित ढंग से संचित। इसका अर्थ है- कंजूसी नहीं करो, व्यवहार में विवेकशील मितव्ययिता लाओ। यह अंतर महत्त्वपूर्ण है।
यह तीनों सूत्रों में सबसे मानवीय और सबसे हृदयस्पर्शी है। घर की नींव दाम्पत्य है। जहां पति-पत्नी के बीच परस्पर सम्मान है, विश्वास है, सहयोग है, वहां घर एक शक्तिकेंद्र बन जाता है। और जहां दाम्पत्य में कलह है, वहां चाहे कितना भी धन हो, चाहे कितनी भी बाहरी समृद्धि हो, घर का वातावरण एक युद्धक्षेत्र बन जाता है।
कलह केवल मानसिक पीड़ा नहीं देती, वह परिवार की उत्पादकता, निर्णय-क्षमता और सामाजिक प्रतिष्ठा- सब को नष्ट करती है। जब माता-पिता लड़ रहे हों तो बच्चे असुरक्षित होते हैं, उनका मानसिक विकास बाधित होता है। जब घर में तनाव हो तो बाहर के कार्यों में भी एकाग्रता नहीं रहती। और लक्ष्मी उस घर में नहीं टिकतीं जहां शांति नहीं।
आधुनिक समाजशास्त्र भी इसे प्रमाणित करता है। सुखी और स्थिर दाम्पत्य संबंध वाले परिवारों के बच्चे अधिक सफल होते हैं, उनका स्वास्थ्य बेहतर होता है और वे समाज में अधिक सकारात्मक योगदान देते हैं। इसके विपरीत टूटे हुए या कलहपूर्ण परिवारों से सामाजिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
इन तीनों सूत्रों को एक साथ देखें तो एक सुंदर और पूर्ण चित्र उभरता है। बौद्धिक व्यवस्था यानी सही लोगों को सही सम्मान। आर्थिक व्यवस्था यानी संसाधनों का विवेकपूर्ण संरक्षण। पारिवारिक व्यवस्था यानी दाम्पत्य में प्रेम और शांति। जहां ये तीनों एक साथ हों, वहां समृद्धि के लिए किसी विशेष प्रयत्न की आवश्यकता नहीं, वह स्वयं चली आती है- श्रीः स्वयमागता।
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