आज का इतिहास: 21 वर्षों की प्रतीक्षा के बाद उधम सिंह ने की थी ओ डायर की हत्या

Michael O Dwyer Killing: उधम सिंह पर अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार का गहरा असर पड़ा और उन्होंने हर कीमत पर इसका बदला लेने का प्रण लिया। वह इस घटना का बदला लेने के लिए लंदन तक गए और वहां जाकर उन्होंने पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ' डायर की हत्या कर दी।

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड13 Mar 2026, 10:57 AM IST
बाएं से दाएं- जनरल रेजिनाल्ड डायर, माइकल ओ' डायर और उधम सिंह।
बाएं से दाएं- जनरल रेजिनाल्ड डायर, माइकल ओ' डायर और उधम सिंह।

13 अप्रैल, 1919। बैसाखी का पर्व। अमृतसर के जलियांवाला बाग में हजारों निहत्थे भारतीय एकत्र थे। जनरल डायर के आदेश पर बिना किसी चेतावनी के गोलियां बरसाई गईं। सैकड़ों लोग मारे गए, हजारों घायल हुए। बाग की दीवारें गोलियों के निशानों से छलनी हो गईं और कुएं लाशों से भर गए। यह केवल नरसंहार नहीं था बल्कि यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद का वह क्रूर चेहरा था जिसने मानवता को तार-तार कर दिया। उस भीड़ में एक युवा थे- उधम सिंह। उन्होंने अपनी आंखों से यह खून की होली देखी। उस दिन उन्होंने प्रण लिया कि वह इस अपमान का बदला अवश्य लेंगे।

कौन था माइकल ओ' डायर?

जनरल रेजिनाल्ड डायर ने गोली चलाने का आदेश दिया था, लेकिन नरसंहार की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी माइकल ओ' डायर पर थी, जो उस समय पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर थ। ओ' डायर न केवल जनरल डायर के कृत्य का समर्थन करता रहा, बल्कि उसने इसे 'सही निर्णय' भी कहा। ब्रिटेन लौटने के बाद भी वह भारतीयों के दमन की नीति का मुखर पैरोकार बना रहा। उधम सिंह की दृष्टि में वही इस अपराध का असली सूत्रधार था।

सबक सिखाने का संकल्प और 21 वर्षों की प्रतीक्षा

उधम सिंह का बदला कोई आवेश में उठाया गया कदम नहीं था। यह 21 वर्षों की सुनियोजित साधना थी। वे अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप की यात्राएं करते रहे, क्रांतिकारी नेटवर्क बनाते रहे और भगत सिंह जैसे विचारकों से प्रेरणा लेते रहे। लंदन पहुंचकर उन्होंने धैर्यपूर्वक अपना समय चुना।

13 मार्च, 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की एक सभा थी। ओ' डायर वहां वक्ता के रूप में उपस्थित थे। उधम सिंह ने अपनी किताब में पिस्तौल छुपाकर हॉल में प्रवेश किया और सभा समाप्त होते ही ओ' डायर पर गोलियां चला दीं। ओ' डायर की मौके पर ही मृत्यु हो गई। उधम सिंह ने भागने का कोई प्रयास नहीं किया। वे जानते थे कि भारत माता की सेवा में यह उनका अंतिम कार्य है।

लंदन में गोलियों की आवाज में गूंजे तीन संदेश

उधम सिंह की यह कार्रवाई महज व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं था बल्कि यह एक गहरा राजनीतिक वक्तव्य था। पहली बात, उन्होंने साम्राज्यवाद को उसी की धरती पर चुनौती दी। ब्रिटेन के हृदयस्थल लंदन में जाकर, एक सार्वजनिक सभा में यह कार्रवाई करके उधम सिंह ने यह सिद्ध किया कि भारतीय अब केवल याचनाएं नहीं करेंगे।

दूसरी बात, उन्होंने जवाबदेही की मांग की। जलियांवाला बाग के दोषी ब्रिटिश न्याय व्यवस्था में कभी सजा नहीं पाए, जनरल डायर को उल्टे 'हीरो' की तरह सम्मानित किया गया था। उधम सिंह ने वह न्याय दिलाया जो संस्थाएं देने में विफल रहीं।

तीसरी बात, यह घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारी धारा की प्रासंगिकता को रेखांकित करती है, जो अहिंसा के साथ-साथ सशस्त्र प्रतिरोध में भी विश्वास रखती थी।

उधम ने अपना नाम मोहम्मद सिंह आजाद क्यों रखा?

सामाजिक दृष्टि से यह घटना उस पीढ़ी की सामूहिक पीड़ा की अभिव्यक्ति थी जो दासता की यातना में जी रही थी। उधम सिंह ने अदालत में कहा था, 'मैंने यह काम अपने देश के लिए किया।' उन्होंने अपना नाम 'राम मोहम्मद सिंह आजाद' बताया। इसके पीछे उनका साफ मकसद था- अंग्रेजों की औपनिवेशिक नीति 'फूट डालो, राज करो' की रणनीति पर सीधा प्रहार। यह नाम हिंदू, मुस्लिम और सिख एकता का प्रतीक था

और हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए अमर बलिदानी

31 जुलाई, 1940 को उधम सिंह को फांसी दे दी गई। वे मुस्कुराते हुए फंदे पर चढ़े। उनकी शहादत ने लाखों भारतीयों में स्वतंत्रता की ललक और तेज कर दी। उधम सिंह का जीवन और बलिदान हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल भाषणों से नहीं, असीम त्याग और अडिग संकल्प से मिलती है। वे सचमुच शहीद-ए-आजम थे।

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