Tulsi Vivah vrat katha in hindi: कैसे वृंदा बनीं तुलसी? तुलसी विवाह पर जरूर पढ़ें ये व्रत कथा

Tulsi Vivah Vrat Katha in hindi: तुलसी विवाह आज 2 नवंबर को मनाया जा रहा है। इस दिन तुलसी माता और भगवान शालिग्राम का विवाह होता है। व्रत कथा के अनुसार, वृंदा के सतीत्व और भगवान विष्णु के वरदान से तुलसी को दिव्य स्थान मिला। पढ़ें व्रत कथा।

Priya Shandilya
अपडेटेड2 Nov 2025, 05:54 PM IST
तुलसी विवाह व्रत कथा
तुलसी विवाह व्रत कथा

Tulsi Vivah Vrat Katha: तुलसी विवाह हर साल देवउठनी एकादशी या द्वादशी तिथि पर मनाया जाता है। इस बार यह 2 नवंबर को है। मान्यता है कि तुलसी विवाह करने से घर में सुख, शांति और बैकुंठ का आशीर्वाद मिलता है। भगवान विष्णु ने तुलसी को वरदान दिया था कि जहां उसका वास होगा, वहां यम के दूत प्रवेश नहीं करेंगे। चलिए जानें क्या है इसके पीछे की कहानी, पढ़ें व्रत कथा।

पूजा कैसे होती है?

इस दिन तुलसी माता और भगवान शालिग्राम की विधिवत पूजा की जाती है। तुलसी विवाह की पूर्णता के लिए व्रत कथा का पाठ करना जरूरी माना जाता है। यह कथा श्रद्धा से सुनने और पढ़ने से घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है।

तुलसी विवाह की विस्तृत व्रत कथा (Tulsi Vivah Vrat Katha)

कहानी शुरू होती है जालंधर नाम के एक शक्तिशाली दैत्य से, जो भगवान शिव के तेज से समुद्र में जन्मा था। उसकी पत्नी वृंदा एक अत्यंत पतिव्रता स्त्री थीं। लेकिन, जालंधर अपनी शक्ति और अहंकार में चूर होकर देवी लक्ष्मी को पाने की इच्छा से युद्ध करने लगा, लेकिन समुद्र से उत्पन्न होने के कारण लक्ष्मी ने उसे भाई मान लिया। फिर जालंधर हारकर देवी पार्वती को पाने के लिए कैलाश पर्वत जा पहुंचा।

वह भगवान शिव का रूप धारण कर पार्वती के पास गया, लेकिन माता पार्वती ने उसे पहचान लिया और अंतर्ध्यान हो गईं। क्रोधित होकर माता पारवती ने यह बात भगवान विष्णु को बताई।

उधर जालंधर को कोई पराजित नहीं कर पा रहा था क्योंकि उसकी पत्नी वृंदा के पतिव्रता धर्म की शक्ति उसे अजेय बना रही थी। ऐसे में भगवान विष्णु ने ऋषि का रूप धारण किया और वृंदा के पास प्रकट हुए। वृंदा ने ऋषि से अपने पति जालंधर के बारे में पूछा। ऋषि ने माया से दो वानर प्रकट किए, एक के हाथ में जालंधर का सिर और दूसरे के हाथ में धड़ था। यह देखकर वृंदा मूर्छित हो गईं। होश में आने पर उन्होंने ऋषि से अपने पति को जीवित करने की प्रार्थना की।

भगवान विष्णु ने माया से सिर और धड़ जोड़ दिए और स्वयं उस शरीर में प्रवेश कर गए। वृंदा को यह छल समझ नहीं आया और उन्होंने जालंधर समझकर पतिव्रता धर्म निभाया। इससे उनका सतीत्व भंग हो गया और उसी क्षण जालंधर युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को इस छल का पता चला, तो उन्होंने भगवान विष्णु को पत्थर बनने का श्राप दे दिया। भगवान ने इसे स्वीकार कर शालिग्राम रूप ले लिया। लेकिन ऐसा करते ही ब्रह्मांड में असंतुलन फैल गया। यह देख सभी देवी-देवताओं ने वृंदा से प्रार्थना की कि वह भगवान को श्राप मुक्त करें। वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप मुक्त कर दिया लेकिन खुद आत्मदाह कर लिया। जहां वह भस्म हुईं, वहां तुलसी का पौधा उग आया।

तुलसी को मिला दिव्य स्थान

वृंदा के सतीत्व और समर्पण से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें एक अनुपम स्थान दिया। उन्होंने कहा, “तुम्हारा प्रेम और तप मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय है। अब तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी।” यही वह क्षण था जब वृंदा, तुलसी बनकर दिव्यता का प्रतीक बन गईं।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथों, पंचांगों और सामान्य मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य सिर्फ आपको जागरूक करना है, मिंट हिंदी इसकी पुष्टि नहीं करता है। कृपया कोई निर्णय लेने से पहले अपनी श्रद्धा और विवेक से काम लें।

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