
Vat Savitri katha in hindi: हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं के लिए वट सावित्री व्रत का स्थान बेहद खास माना गया है। अपने पति की लंबी आयु, अच्छी सेहत और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि के लिए सुहागन स्त्रियां इस दिन पूरे विधि-विधान से वट (बरगद) के वृक्ष की पूजा करती हैं। इस पावन व्रत की कथा का विस्तृत वर्णन 'स्कंद पुराण' में मिलता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को इस महाव्रत और प्रभास क्षेत्र में स्थित देवी सावित्री के असाधारण चरित्र के बारे में बताया था। ऐसा कहा जाता है कि वट वृक्ष के नीचे बैठकर इस कथा को विस्तार से पढ़ने या सुनने मात्र से ही महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है।
मद्र देश में अश्वपति नाम के एक धर्मात्मा राजा रहते थे। वह सत्यवादी, दयालु और प्रजा के हित में काम करने वाले शासक थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की इच्छा से राजा अश्वपति अपनी रानी के साथ प्रभास क्षेत्र पहुंचे और वहां सावित्री व्रत का विधि-विधान से पालन किया।
उनकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर देवी सावित्री ने उन्हें दर्शन दिए। कुछ समय बाद राजा के घर एक कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम देवी के आशीर्वाद से सावित्री रखा गया।
राजकुमारी सावित्री धीरे-धीरे बड़ी होने लगीं। उनका रूप और तेज इतना अद्भुत था कि लोग उन्हें देवी समान मानते थे। जब वह विवाह योग्य हुईं, तो राजा अश्वपति को उनकी आत्मा के अनुरूप कोई योग्य वर नहीं मिल पा रहा था। तब राजा ने धर्मशास्त्रों का हवाला देते हुए सावित्री से कहा कि वह स्वयं अपने मंत्रियों के साथ जाकर अपने लिए योग्य वर की तलाश करें। पिता की आज्ञा मानकर सावित्री तपोवन की ओर निकल पड़ीं।
घूमते-घूमते वह शाल्व देश के नेत्रहीन और राजपाट गंवा चुके राजा द्युमत्सेन के आश्रम में पहुंचीं। वहां उन्होंने उनके परम धार्मिक और सत्यवादी पुत्र 'सत्यवान' को देखा और मन ही मन उन्हें अपना पति स्वीकार कर लिया।
जब सावित्री लौटकर महल आई, तो वहाँ पिता के साथ देवर्षि नारद बैठे हुए थे। सावित्री ने जब सत्यवान के वरण की बात बताई, तो नारद जी चौंक गए। उन्होंने राजा से कहा कि सावित्री ने बड़ा कष्टप्रद फैसला ले लिया है। सत्यवान भले ही मिट्टी और चित्र के घोड़े बनाने के कारण 'चित्राश्व' कहलाते हों, भले ही वह राजा ययाति की तरह उदार और अश्विनी कुमारों की तरह रूपवान हों, लेकिन उनमें एक बहुत बड़ा दोष है—उनकी आयु बहुत कम है और आज से ठीक एक वर्ष बाद वह देह त्याग देंगे।
यह सुनकर राजा अश्वपति घबरा गए और उन्होंने बेटी को समझाने की कोशिश की। लेकिन सावित्री ने बड़ी दृढ़ता से कहा, "पिताजी! राजा एक ही बार बोलते हैं, ब्रह्मबेत्ता एक ही बार कहते हैं और कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है। वर चाहे अल्पायु हो या दीर्घायु, मैंने उन्हें चुन लिया है, अब मैं अपना मन नहीं बदलूंगी।" अंततः नारद जी के कहने पर दोनों का विवाह संपन्न हुआ।
राजा ने शुभ मुहूर्त में सावित्री और सत्यवान का विवाह करवा दिया। विवाह के बाद सावित्री अपने पति और सास-ससुर के साथ वन में रहने लगीं। लेकिन उन्हें नारदजी की बात हमेशा याद रहती थी कि एक दिन सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी। जब वह दिन नजदीक आया, तब सावित्री ने तीन दिन तक कठोर व्रत रखा और भगवान की पूजा की।
निर्धारित दिन सत्यवान लकड़ी काटने जंगल गए और सावित्री भी उनके साथ चली गईं। काम करते-करते अचानक सत्यवान के सिर में तेज दर्द होने लगा। सावित्री ने उन्हें अपनी गोद में सिर रखकर आराम करने को कहा। कुछ ही देर बाद सावित्री ने देखा कि वहां यमराज स्वयं खड़े हैं। यमराज ने कहा कि सत्यवान की आयु पूरी हो चुकी है और वह उनकी आत्मा लेने आए हैं।
यमराज सत्यवान की आत्मा लेकर आगे बढ़ने लगे, लेकिन सावित्री भी उनके पीछे चलने लगीं। यमराज ने उन्हें लौट जाने को कहा, लेकिन सावित्री ने पति धर्म और पतिव्रता का महत्व बताते हुए उनका पीछा नहीं छोड़ा। सावित्री की बातों और उनके समर्पण से यमराज प्रसन्न हो गए और उन्होंने वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने पहले अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी और उनका खोया हुआ राज्य वापस मांगा। फिर उन्होंने सौ पुत्रों का वरदान भी मांग लिया। यमराज ने वरदान दे दिए, लेकिन बाद में उन्हें एहसास हुआ कि बिना सत्यवान के जीवित हुए यह वरदान पूरे नहीं हो सकते।आखिरकार यमराज ने सत्यवान के प्राण वापस कर दिए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट सावित्री व्रत पति-पत्नी के रिश्ते में प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सुहागन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। मान्यता है कि इससे पति की आयु लंबी होती है और वैवाहिक जीवन सुखी बना रहता है।
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