Ramadan 2026: क्या होता है रमजान? इस पवित्र महीने को कैसे मनाते हैं मुस्लिम, जानें यहां

रमजान इस्लाम का पवित्र महीना है, जिसमें मुसलमान सुबह से सूर्यास्त तक रोजा रखते हैं। यह इबादत, आत्मसंयम, दान और आत्मचिंतन का समय होता है। लोग इफ्तार में साथ जुटते हैं। बीमार और सफर करने वालों को छूट है। रमजान के बाद ईद अल फितर मनाई जाती है।

Manali Rastogi
अपडेटेड13 Feb 2026, 12:50 PM IST
रमजान 2026
रमजान 2026(Pixabay)

दुनिया भर के आस्थावान मुस्लिम जल्द ही रोजाना सुबह से सूर्यास्त तक रोजा रखने की परंपरा में एक साथ जुड़ेंगे, क्योंकि इस्लाम का पवित्र महीना रमजान शुरू होने वाला है। मुसलमानों के लिए यह समय ज्यादा इबादत, आत्मचिंतन, दान और अच्छे काम करने का होता है।

सामाजिक रूप से भी यह महीना खास होता है, क्योंकि रोजा खोलने के लिए परिवार और दोस्त एक साथ इफ्तार में जुटते हैं। रमजान के बाद इस्लामी त्योहार ईद अल फितर मनाया जाता है।

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रमजान की धार्मिक परंपराएं और इसकी आध्यात्मिक भावना दुनिया भर के अलग अलग मुस्लिम समुदायों को एक साथ जोड़ती हैं। इस दौरान कई लोग अपने साथी मुसलमानों की परेशानियों और दुनिया में चल रहे संघर्ष या राजनीतिक हालात के लिए दुआ करते हैं, दान देते हैं या समर्थन करते हैं।

मुसलमान रोजा क्यों और कैसे रखते हैं?

रोजा इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है। बाकी चार हैं ईमान की गवाही, नमाज, जकात और हज। मुसलमान रोजे को कई अर्थों में देखते हैं। रोजा रखना इबादत का एक तरीका है, जिससे इंसान अल्लाह के करीब होता है और परहेजगारी हासिल करता है। यह आत्मसंयम सिखाता है, कृतज्ञता की भावना बढ़ाता है और गरीब तथा भूखे लोगों की तकलीफ को समझने में मदद करता है।

रमजान में रोजा रखने वाले लोग सुबह से सूर्यास्त तक खाने पीने से पूरी तरह परहेज करते हैं। एक बूंद पानी भी नहीं पीते। सूर्यास्त के बाद रोजा इफ्तार नाम के भोजन से खोला जाता है। रोजा रखने वालों से यह भी उम्मीद की जाती है कि वे बुरे कामों जैसे चुगली से बचें और अच्छे काम ज्यादा करें। इस महीने में मुसलमान मस्जिदों में इकट्ठा होकर नमाज अदा करते हैं और कुरान शरीफ की तिलावत में ज्यादा समय बिताते हैं।

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रमजान में दान का खास महत्व है। कई लोग जरूरतमंदों के लिए इफ्तार का इंतजाम करते हैं, राशन के डिब्बे बांटते हैं, खजूर और जूस के साथ गर्म खाना वितरित करते हैं या सामूहिक मुफ्त भोजन का आयोजन करते हैं। रोजा रखने से पहले मुसलमान सुबह बहुत जल्दी सुहूर नाम का भोजन करते हैं, ताकि पूरे दिन के लिए शरीर को ताकत मिल सके।

क्या रोजा रखने से छूट मिलती है?

हां, कुछ लोगों को रोजा न रखने की छूट है। जैसे बीमार व्यक्ति या सफर कर रहे लोग। जो लोग अस्थायी बीमारी या यात्रा की वजह से रोजा नहीं रख पाते, उन्हें बाद में छूटे हुए रोजे पूरे करने होते हैं।

रमजान से जुड़ी सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराएं

मुसलमान नस्ल और संस्कृति के हिसाब से बहुत विविध हैं, इसलिए रमजान की सभी परंपराएं केवल धार्मिक नहीं होतीं। कुछ रिवाज कई देशों में समान होते हैं, जबकि कुछ अलग अलग संस्कृतियों के अनुसार बदल जाते हैं। कई सामाजिक परंपराएं रोजा खोलने के बाद मेल मिलाप और साथ बैठने से जुड़ी होती हैं। कुछ लोग अपने घर सजाते हैं, रमजान थीम वाले बर्तन और सजावट रखते हैं या बाजारों और रमजान मेलों में जाते हैं।

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मिस्र में, जो अरब दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है, रमजान आमतौर पर खुशियों का समय होता है। रंग बिरंगी लालटेन अलग अलग आकार में बच्चों के हाथों में दिखाई देती हैं और घरों, इमारतों और दुकानों के बाहर सजाई जाती हैं। रमजान के स्वागत में खास गीत भी बजाए जाते हैं। वहां एक खास परंपरा है जिसमें सहरी के समय एक व्यक्ति ढोल बजाते हुए गलियों में घूमता है। उसे मसहराती कहा जाता है। वह लोगों को, कभी कभी नाम लेकर, सुहूर के लिए जगाता है।

(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)

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