
लोकसभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक पेश कर दिया गया है। इसे केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रस्तुत किया और उन्होंने इसे मुस्लिम समाज के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया। इस विधेयक या बिल को लेकर इतनी चर्चा क्यों हो रही है आइये जानें।
वक्फ इस्लामिक कानून के तहत एक ऐसा दान होता है, जिसमें किसी संपत्ति को धार्मिक या सामाजिक कल्याण के लिए स्थायी रूप से समर्पित कर दिया जाता है। यह संपत्ति आमतौर पर जमीन, इमारत, या अन्य परिसंपत्तियां होती हैं, जिनका स्वामित्व बदला नहीं जा सकता। इसे प्रबंधित करने के लिए एक 'मुतवल्ली' या ट्रस्टी नियुक्त किया जाता है, जो इस संपत्ति से होने वाली आय को तय उद्देश्यों के लिए उपयोग करता है। वक्फ संपत्तियों का उपयोग मस्जिद, स्कूल, अस्पताल, पुल, कब्रिस्तान और पीने के पानी की सुविधा जैसी सार्वजनिक सेवाओं के लिए किया जाता है।
भारत में वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन वक्फ बोर्ड द्वारा किया जाता है, जो एक वैधानिक निकाय है। भारत में करीब 8.7 लाख वक्फ संपत्तियां हैं, जो 9.4 लाख एकड़ भूमि पर फैली हुई हैं, जिससे यह देश का तीसरा सबसे बड़ा जमीनी मालिक बनता है।
मंत्री रिजिजू का कहना है कि भारत में दुनिया की सबसे अधिक वक्फ संपत्तियां हैं, लेकिन मौजूदा कानूनों में खामियों के कारण उनका सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। यह नया बिल इन संपत्तियों की बेहतर प्रबंधन और पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए लाया गया है। मंत्री रिजिजू के अनुसार, इतनी बड़ी संपत्तियों से मात्र 100 करोड़ रुपये सालाना आमदनी होती है, जबकि यह हजारों करोड़ होनी चाहिए।
इस विधेयक में वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन और पारदर्शिता के लिए कई संशोधन का प्रस्ताव रखा गया है।
इस बिल को लेकर विपक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई है। कांग्रेस, NCP, AAP और अन्य विपक्षी दलों ने इसे “असंवैधानिक और विभाजनकारी” बताया है। उनका आरोप है कि सरकार ने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की सिफारिशों को नज़रअंदाज किया है।
कांग्रेस नेता खलीकुर रहमान का कहना है कि यह विधेयक वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता (autonomy) को कमजोर करता है और जिलाधिकारियों को अधिक शक्तियां देता है। वहीं, कांग्रेस सांसद किरण कुमार चमाला ने कहा कि यदि यह बिल किसी समुदाय के अस्तित्व को प्रभावित करता है, तो विपक्ष इसका कड़ा विरोध करेगा।
केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री किरेन रिजिजू ने वक्फ कानून का पूरा इतिहास बताया। उन्होंने कहा कि आजादी से पहले यह बिल जब पहली बार मुसलमान वक्त वैलिडेटिंग एक्ट पास किया गया था 1913 में, तब से इसका इतिहास शुरू होता है। उससे पहले प्रीवी काउंसिल ने 1894 में इनवैलिडेट किया था वक्फ अल औलाद को। बाद में उसका प्रॉपर लीगल फॉर्म में 1913 के बाद, फिर 1923 में द मुसलमान वक्फ एक्ट लाया गया था। उसमें अकाउंटिंग और ट्रांसपेरेंसी के बारे में यह जोर उसको देते हुए यह एक्ट पास किया गया था।
फिर 1930 में द मुसलमान वक्प वैलिडेटिंग एक्ट लाया गया है जो रिइनफोर्स करता है लीगल वैलिडिटी ऑफ द फैमिली वक्फ। परिवार में जो वक्फ होता है उसको जोर देते हुए यह बिल लाया गया है। उसके बाद आजादी के बाद 1954 में वक्फ एक्ट पहली बार आजाद भारत का एक्ट बना है। और उस समय 1954 के एक्ट में ही स्टेट वक्फ बोर्ड का भी प्रावधान किया गया था। उस समय से लेकर के कई संशोधन के साथ 1995 में व्यापक रूप से वक्फ कानून बना है।
रिजिजू ने आगे बताया, '1995 में ट्राइब्यूनल का पहला व्यवस्था किया गया है ताकि वक्फ बोर्ड का कोई भी निर्णय किसी को अगर पसंद नहीं है या उसे चैलेंज करना चाहता है तो वह ट्राइब्यूनल के पास जा सके। उसका प्रावधान पहली बार तभी हुआ था। उसी वक्त यह भी फैसला हुआ था कि 5 लाख से ज्यादा आमदनी किसी वक्त प्रॉपर्टी में है तो उसके लिए सरकार एग्जीक्यूटिव ऑफिसर्स अपॉइंट करेगी। यह प्रावधान भी 1995 में आया था।'
2013 में यूपीए सरकार ने वक्फ कानून में संशोधन किया। कानून में यह प्रावधान किया कि सिर्फ मुसलमान नहीं, हिंदू, जैन, बौद्ध, इसाई, पारसी, मतलब कोई भी धर्म-जाति का इंसान अपनी प्रॉपर्टी वक्फ कर सकता है। सबको मालूम है मुसलमान अल्लाह के नाम पर अपनी संपत्ति दान कर सकता है। लेकिन 2013 में कानून बदलकर यह कर दिया कि मुसलमान नहीं, कोई भी अपनी प्रॉपर्टी वक्फ बोर्ड को दान कर सकता है। फिर वक्फ कानून की धारा 108 में प्रावधान किया गया कि यह कानून देश के किसी भी अन्य कानून से ऊपर है। हर कानून अपने-अपने हिसाब से काम करता है।
रिजिजू ने कहा कि यह देश कैसे मंजूर कर सकता है कि कोई एक कानून बाकी सभी कानूनों से ऊपर हो?
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