Gauri Ganesha Chaturthi Vrat Katha: गणेश जयंती पर जरूर पढ़ें गौरी गणेश चतुर्थी व्रत कथा, पूरी होगी हर मनोकामना

गणेश जयंती माघ शुक्ल चतुर्थी को मनाई जाती है। इस दिन भगवान गणेश के जन्म की कथा पढ़ी जाती है। देवी पार्वती द्वारा रचित गणेश को शिव ने गजानन रूप देकर गणों का स्वामी बनाया। यह दिन बाधा निवारण और शुभ आरंभ का प्रतीक है।

Manali Rastogi
पब्लिश्ड21 Jan 2026, 06:03 PM IST
Gauri Ganesha Chaturthi Vrat Katha: गणेश जयंती पर जरूर पढ़ें गौरी गणेश चतुर्थी व्रत कथा, पूरी होगी हर मनोकामना
Gauri Ganesha Chaturthi Vrat Katha: गणेश जयंती पर जरूर पढ़ें गौरी गणेश चतुर्थी व्रत कथा, पूरी होगी हर मनोकामना

गणेश जयंती, जिसे माघी गणेश चतुर्थी या वरद चतुर्थी भी कहा जाता है, माघ महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। यह दिन भगवान गणेश के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। वैसे तो हर महीने कृष्ण और शुक्ल पक्ष में गणेश चतुर्थी आती है, लेकिन माघ शुक्ल चतुर्थी को सबसे अधिक शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त विघ्नहर्ता गणेश की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और श्रद्धा से गणेश जयंती व्रत कथा का पाठ करते हैं।

गणेश जयंती व्रत कथा (Gauri Ganesh Chaturthi Vrat Katha In Hindi)

इस कथा में भगवान गणेश के दिव्य अवतार की कहानी है, जो भक्ति, कर्तव्य और करुणा का संदेश देती है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवी पार्वती की सखियों जया और विजया ने उनसे कहा कि भगवान शिव के गण केवल शिव के प्रति निष्ठावान हैं, वे पार्वती के नहीं हैं। यह बात पार्वती के मन में बैठ गई और उन्होंने सोचा कि उनका भी कोई ऐसा रक्षक होना चाहिए, जो केवल उन्हीं की सेवा करे।

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एक दिन जब देवी पार्वती स्नान कर रही थीं, तभी भगवान शिव उनसे मिलने आ गए। पार्वती को यह अच्छा नहीं लगा कि बिना अनुमति कोई भीतर आ जाए। तब उन्होंने सोचा कि यदि कोई द्वारपाल होता तो ऐसा न होता।

यह सोचकर देवी पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसमें प्राण फूंक दिए। उन्होंने उसे अपना पुत्र घोषित किया और उसे बल, साहस और भक्ति का वरदान दिया। बालक ने मां की आज्ञा का पालन करने का वचन दिया।

पार्वती ने उसे द्वार की रक्षा करने को कहा और आदेश दिया कि बिना अनुमति किसी को भीतर न आने दे। कुछ समय बाद भगवान शिव आए, लेकिन बालक ने उन्हें रोक दिया। इससे शिव क्रोधित हो गए और अपने गणों को उसे हटाने का आदेश दिया, लेकिन कोई भी उसे हरा नहीं सका।

क्रोध में आकर शिव ने बालक का सिर काट दिया। जब पार्वती लौटीं और यह दृश्य देखा, तो उनका दुःख भयंकर क्रोध में बदल गया।

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उनका प्रचंड रूप देखकर पूरा संसार कांप उठा। देवताओं ने पार्वती से क्षमा मांगी और उन्हें शांत किया। तब शिव ने कहा कि उत्तर दिशा की ओर मुख किए पहले जीव का सिर लाया जाए। देवताओं को एक हाथी मिला।

उसका सिर बालक के धड़ पर लगाया गया और दिव्य जल से उसे जीवित किया गया। इस प्रकार बालक पुनः जीवित हुआ। भगवान शिव ने उसे गले लगाया और वरदान दिया कि वह गणों का प्रधान होगा और किसी भी शुभ कार्य से पहले उसी की पूजा होगी। तभी से वे गजानन गणेश कहलाए।

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गणेश जयंती भगवान गणेश के दिव्य जन्म और उनके विघ्नहर्ता स्वरूप की याद दिलाती है। इस दिन श्रद्धा से कथा का पाठ करने से जीवन में शांति, बुद्धि और शुभ आरंभ का आशीर्वाद मिलता है।

(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)

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