
Lohri 2026: लोहड़ी 2026 में मंगलवार, 13 जनवरी को पड़ेगी। तारीख तो सीधी-सी है, लेकिन लोहड़ी का मज़ा कैलेंडर देखकर शुरू नहीं होता। असली उत्साह तो एक शाम पहले ही आ जाता है। 12 जनवरी की शाम होते-होते लोग लकड़ियां जुटाने लगते हैं, गानों की लिस्ट बनती है, रिश्तेदारों को फोन और मैसेज जाने लगते हैं और माहौल पूरी तरह जश्न वाला हो जाता है।
लोहड़ी को सर्दियों को विदा करने और गर्माहट का स्वागत करने का त्योहार माना जाता है। इसकी शुरुआत एक फसल उत्सव के रूप में हुई थी। किसानों के लिए यह आज भी फसल, मेहनत और प्रकृति के प्रति धन्यवाद देने का दिन है। लेकिन ज़्यादातर लोगों के लिए लोहड़ी वह त्योहार है जब अलाव के चारों ओर खड़े होकर मन अपने-आप हल्का हो जाता है।
ठंड लगती है, लेकिन हंसी रुकती नहीं। थकान होती है, लेकिन ढोल बजते ही शरीर में नई ऊर्जा आ जाती है। भले ही आपने कभी खेत में काम न किया हो, फिर भी आप समझ जाते हैं कि यह त्योहार क्यों खास है। यह गर्माहट का एहसास है, बाहर भी और दिल के अंदर भी।
हर त्योहार के पीछे एक कहानी होती है और लोहड़ी की कहानी बहुत मजबूत है। इस कहानी का नाम है दुल्ला भट्टी। उन्हें पंजाब का लोक नायक माना जाता है। वे गलत के खिलाफ खड़े होने वाले इंसान थे।
दुल्ला भट्टी ने उन लड़कियों की मदद की जिन्हें जबरदस्ती बुरे हालात में धकेला जा रहा था। उन्होंने उनकी इज्जत के साथ शादी करवाई और वह काम किया जिससे लोग डरते थे। यही वजह है कि लोहड़ी के गीतों में उनका नाम आज भी लिया जाता है। अलाव के चारों ओर गाए जाने वाले गीत सिर्फ मनोरंजन नहीं होते, वे ऐसे इंसान की याद होते हैं जिसने सच में कुछ अच्छा किया।
अगर आपने कभी असली लोहड़ी देखी है, तो आप जानते हैं कि इसमें कुछ भी बनावटी नहीं होता। थोड़ा शोर, थोड़ी अव्यवस्था और बहुत सारी खुशी।
शाम होते ही अलाव जलाया जाता है। लोग अपने-आप उसके चारों ओर इकट्ठा हो जाते हैं। तिल, मूंगफली, पॉपकॉर्न, गुड़ और रेवड़ी अलाव में डाली जाती है। कोई यह नहीं सोचता कि इसका मतलब क्या है। सब बस इसलिए करते हैं क्योंकि यही परंपरा है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है।
फिर संगीत शुरू होता है। जो लोग कहते हैं कि उन्हें नाचना नहीं आता, वे भी थिरकने लगते हैं। बच्चे मिठाइयों से भरी जेब लेकर इधर-उधर दौड़ते हैं। और हर परिवार में एक चाचा जरूर होते हैं जो अपनी ही ताल पर ताली बजा रहे होते हैं।
बहुत से लोग लोहड़ी का इंतजार खाने की वजह से करते हैं। यहां कुछ भी फैंसी नहीं होता, बस सादा और दिल को सुकून देने वाला खाना।
रेवड़ी, गजक, गरम मूंगफली, ताज़ा पॉपकॉर्न और सरसों का साग व मक्के की रोटी। ठंड में, अलाव के पास, ये चीजें और भी स्वादिष्ट लगती हैं। यहां दिखावे से ज़्यादा मायने होते हैं अपनापन और यह भावना कि “लो, खाओ, लोहड़ी है।”
लोहड़ी इसलिए जिंदा है क्योंकि यह सच्चा त्योहार लगता है। पूरे साल जिन परिवारों को समय नहीं मिलता, वे भी इस एक शाम के लिए इकट्ठा हो जाते हैं। विदेश में रहने वाले लोग भी वीडियो कॉल पर घर की लोहड़ी देखना चाहते हैं।
नए शादीशुदा जोड़े और छोटे बच्चों पर खास ध्यान दिया जाता है, उन्हें आशीर्वाद दिया जाता है और ढेर सारी तस्वीरें ली जाती हैं। उत्तर भारत की सर्दियां कड़ी होती हैं, लेकिन लोहड़ी यह याद दिलाती है कि मौसम बदलता है और ठंड हमेशा नहीं रहती।
इसके लिए बड़ी भीड़ या खुले मैदान की जरूरत नहीं। छोटा-सा अलाव या बालकनी में दीया जलाना भी काफी है। पास के लोगों के साथ तिल-मिठाई बांटिए। पंजाबी गाना थोड़ा तेज़ बजाइए। माता-पिता को फोन कीजिए। लोहड़ी से जुड़ी कोई पुरानी याद साझा कीजिए।
लोहड़ी सिर्फ तारीख नहीं है। यह एक ठंडी शाम है जो लोगों, आवाज़ों, खाने और आग की गर्मी से खास बन जाती है। 13 जनवरी 2026 भी बाकी तारीखों की तरह बीत जाएगी, लेकिन अलाव के पास की हंसी, गीत और कपड़ों में बसी हल्की-सी धुएं की खुशबू लंबे समय तक याद रह जाती है।
(डिस्क्लेमर: ये सलाह सामान्य जानकारी के लिए दी गई है। कोई फैसला लेने से पहले विशेषज्ञ से बात करें। मिंट हिंदी किसी भी परिणाम के लिए जिम्मेदार नहीं है।)
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