Paush Amavasya 2025: कब है साल की आखिरी अमावस्या? जानिए तिथि, महत्व और पूजा विधि

पौष अमावस्या, जो वर्ष 2025 की आखिरी अमावस्या है, 19 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी। इस दिन की तिथि का समय, धार्मिक महत्व और किए जाने वाले प्रमुख अनुष्ठानों से जुड़ी सभी जरूरी जानकारियां जानें, ताकि आप अपने पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त कर सकें।

Manali Rastogi
पब्लिश्ड18 Dec 2025, 06:54 AM IST
Paush Amavasya 2025: कब है साल की आखिरी अमावस्या? जानिए तिथि, महत्व और पूजा विधि
Paush Amavasya 2025: कब है साल की आखिरी अमावस्या? जानिए तिथि, महत्व और पूजा विधि(PTI)

हिंदू धर्म में अमावस्या यानी नए चंद्रमा का दिन बहुत विशेष माना जाता है। यह दिन पूर्वजों (पितरों) को समर्पित होता है। पौष महीने में पड़ने वाली अमावस्या को पौष अमावस्या कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह साल की अंतिम अमावस्या होती है, इसलिए इसका आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व और भी बढ़ जाता है।

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इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य, पितरों के लिए तर्पण और अन्य धार्मिक कर्म करना बहुत शुभ माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष पौष अमावस्या 19 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी।

तिथि और समय

पौष अमावस्या से जुड़ी तिथि और समय इस प्रकार है:

  • पौष अमावस्या 2025 की तारीख: 19 दिसंबर 2025, शुक्रवार
  • अमावस्या तिथि शुरू: सुबह 04:59 बजे, 19 दिसंबर 2025
  • अमावस्या तिथि समाप्त: सुबह 07:12 बजे, 20 दिसंबर 2025

जानिए महत्व

हिंदू धर्म में पौष अमावस्या का बहुत महत्व है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य पितरों का स्मरण और सम्मान करना होता है। मान्यता है कि इस दिन दान-पुण्य और पवित्र स्नान करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं।

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पितरों के नाम पर दान करने और उनकी पूजा करने से उनका आशीर्वाद मिलता है, जिससे जीवन में सफलता और समृद्धि आती है। यह दिन पितृ दोष के प्रभाव को कम करने और जीवन की बाधाओं को दूर करने में भी सहायक माना जाता है। इस दिन सूर्य देव और भगवान विष्णु की पूजा करना भी बहुत लाभकारी माना गया है।

जानिए क्या है पूजा विधि

पौष अमावस्या के दिन किए जाने वाले प्रमुख कर्म इस प्रकार हैं:

1. पवित्र स्नान करें: सुबह जल्दी उठकर गंगा जैसी पवित्र नदी में स्नान करना बहुत शुभ माना जाता है। यदि नदी में स्नान संभव न हो, तो घर पर नहाते समय पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें।

2. पितरों को तर्पण दें: स्नान के बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को तर्पण देना चाहिए। जल में काले तिल मिलाकर धीरे-धीरे भूमि पर अर्पित करें। मान्यता है कि इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।

3. सूर्य देव की पूजा करें: पौष महीना सूर्य देव को समर्पित होता है। इसलिए सूर्योदय के समय तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।

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4. पीपल के वृक्ष की पूजा और दीपक जलाएं: शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और उसके 7 परिक्रमा करें। इसके अलावा घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर पितरों के नाम से सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

5. दान-पुण्य करें: इस पावन दिन अनाज, गर्म कपड़े, कंबल और तिल का दान गरीबों और जरूरतमंदों को करें। किसी ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराना भी बहुत पुण्यदायक माना जाता है।

(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। मिंट हिंदी इस जानकारी की सटीकता या पुष्टि का दावा नहीं करता। किसी भी उपाय या मान्यता को अपनाने से पहले किसी योग्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।)

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