UGC Bill 2026 in Hindi: UGC गाइडलाइंस में ऐसा क्या है कि उबल गया सवर्ण समाज? एक-एक प्रावधान को जानिए

उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देने संबंधी यूजीसी के रेग्युलेशन ने देश के कई स्थानों पर विरोध-प्रदर्शन और आंदोलनों को जन्म दिया है। देशभर में इन विनियमों के खिलाफ व्यापक विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, जिनमें सोशल मीडिया पर हो रहे विरोध भी शामिल हैं।  

Naveen Kumar Pandey
अपडेटेड28 Jan 2026, 06:21 PM IST
यूजीसी गाइडलाइंस के खिलाफ प्रदर्शन।
यूजीसी गाइडलाइंस के खिलाफ प्रदर्शन।(PTI)

UGC Guidelines News: सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026 पर रोक लगा दी। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉमाल्या बागची की पीठ ने रेग्युलेशन की भाषा पर बेहद कड़ी टिप्पणी की है।

उधर, यूजीसी की गाइडलाइंस के खिलाफ विभिन्न मोर्चों पर विरोध-प्रदर्शन जारी हैं। इस मामले पर जमकर राजनीति भी हो रही है। आइए जानते हैं कि आखिर 13 जनवरी, 2026 को अधिसूचित यूजीसी गाइडलाइंस में ऐसा क्या है जिसने एक वर्ग में उबाल ला दिया है।

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UGC Bill 2026 in Hindi की 10 मुख्य बातें

अधिकारियों के अनुसार, सरकार ने 13 जनवरी को नए विनियम अधिसूचित किए जिनके तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच करने और समता को बढ़ावा देने के वास्ते 'समता समितियों' का गठन अनिवार्य किया गया है।

  • यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026 के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि इन समितियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), दिव्यांग जन (पीडब्ल्यूडी) और महिलाएं शामिल हों।
  • इन विनियमों का एक प्रारूप पिछले वर्ष फरवरी में जनता से सुझाव और प्रतिक्रियाएं प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक किया गया था।
  • यह दस्तावेज उस समय जारी किया गया था जब उच्चतम न्यायालय ने 2012 के यूजीसी विनियमों के क्रियान्वयन पर सवाल उठाने संबंधी रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की ओर से दायर याचिका की सुनवाई की। इस दौरान यूजीसी को नए विनियम प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था।
  • रेग्युलेशंस में निर्धारित उद्देश्यों के अनुसार, इसका लक्ष्य धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म स्थान, जाति या दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना है। इसका उद्देश्य विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दिव्यांगजनों या इनमें से किसी के भी विरुद्ध होने वाले भेदभाव को खत्म करना, तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के सभी हितधारकों के बीच पूर्ण समता और समावेशन को बढ़ावा देना है।
  • नया रेग्युलेशन यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2012 का स्थान पर लाया गया है। 2012 के रेग्युलेशन मुख्यतः परामर्शात्मक (एडवाइजरी) प्रकृति के थे। इसके विपरीत, नया रेग्युलेशन अनिवार्य और बाध्यकारी है तथा इसके तहत केंद्र और समिति की स्थापना, भेदभाव न हो यह सुनिश्चित करने के लिए हेल्पलाइन की व्यवस्था, और इसके साथ-साथ एक समग्र निगरानी तंत्र प्रदान किया गया है।

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यूजीसी गाइडलाइंस की किन बातों का हो रहा है विरोध?

  • मुख्यतः सामान्य या अनारक्षित वर्गों के लोग नए रेग्युलेशन का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि ये रेग्युलेशन उनके प्रति भेदभावपूर्ण हो सकते हैं। यूजीसी (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026 का विनियम 3(सी) 'गैर-समावेशी' है और यह सामान्य श्रेणी के छात्रों और शिक्षकों की रक्षा करने में विफल है। आलोचकों का कहना है कि इस रेग्युलेशन में सामान्य वर्ग के लोगों को पहले ही अपराधी ठहरा दिया गया है जिस पर आरोप लगाने भर की देर है। आरोप लगता ही उसका कैरियर दांव पर लग जाएगा।
  • आलोचकों का कहना है कि इस विनियम में दुरुपयोग वाली शिकायतों से सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है और भेदभाव की परिभाषा अस्पष्ट बनी हुई है। अगर एससी-एसटी या ओबीसी वर्ग का कोई छात्र, शिक्षक या कर्मचारी सामान्य वर्ग के किसी व्यक्ति के खिलाफ झूठी शिकायत करता है और उसका यह झूठ साबित भी हो जाता है तो उसे दंडित करने का कोई प्रावधान नहीं है। इस कारण प्रतिद्वंद्विता में पिछड़ने पर या दुश्मनी निकालने के उद्देश्य से भी सामान्य वर्ग के किसी छात्र/छात्रा, शिक्षक या कर्मचारी को परेशान किया जा सकता है। ऐसे में किसी निर्दोष की जिंदगी बर्बाद हो सकती है, लेकिन झूठा आरोप लगाने वाले का बाल बांका नहीं होगा। इस कारण झूठे आरोप लगाकर दुश्मनी साधने की प्रवृत्ति पनपेगी और बढ़ेगी जिससे कैंपस जातीय विद्वेष का केंद्र बन जाएगा। ऐसे में रेग्युलेशन लाने की मूल भावना के विपरीत प्रभाव पैदा होगा।
  • आलोचक इस प्रावधान को बहुत खतरनाक मान रहे हैं जिसमें कहा गया है कि अगर एसी-एसटी या ओबीसी वर्ग के किसी व्यक्ति को ऐसा लगता भी है कि उसका अपमान हुआ है तो भी वह शिकायत कर सकता है। यानी, शिकायतकर्ता किसी प्रमाण या सबूत के बिना सामान्य वर्ग के किसी भी व्यक्ति पर भेदभाव करने या अपमान करने का आरोप मढ़ सकता है। उसकी शिकायत पर आरोपी के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो जाएगी।
  • इसके अलावा समता समितियों में 'सामान्य' वर्ग का प्रतिनिधित्व अनिवार्य न होने की व्यवस्था की भी आलोचना की गई है। समता समिति में सामान्य श्रेणी के सदस्य होने का कानूनी प्रावधान नहीं किया गया है, लेकिन अन्य सभी श्रेणियों के लिए लिखित प्रावधान हैं।
  • आलोचकों की मांग है कि यूजीसी गाइडलाइंस में सामान्य वर्ग को कोई सुरक्षा नहीं दी गई है। उनका कहना है कि कैंपस में अगर सामान्य वर्ग के लोगों के साथ भेदभाव होता है, उन्हें प्रताड़ित किया जाता है या उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया जाता है तो
  • विरोधियों की मांग है कि नियम 3(सी) पर पुनर्विचार लंबित रहने तक गाइडलाइंस के तहत जाति-निरपेक्ष तरीके से सबको समान अवसर उपलब्ध कराई जाए। उनका कहना है कि जातिगत पहचान के आधार पर शिकायत निवारण तंत्र तक पहुंच प्रदान करने से इनकार करने का मतलब है कि राज्य ही समाज के एक वर्ग के साथ भेभदाव कर रहा है। यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1) और 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

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सरकार का आश्वासन- किसी से भेदभाव नहीं होने दिया जाएगा

हालांकि, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मंगलवार को आश्वासन दिया कि किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा। उन्होंने कहा, ‘मैं विनम्रतापूर्वक सभी को आश्वस्त करना चाहता हूं कि किसी को भी किसी प्रकार के उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ेगा, कोई भेदभाव नहीं होगा और किसी को भी भेदभाव के नाम पर इस नियम का दुरुपयोग करने का अधिकार नहीं होगा।’

2019 की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया था निर्देश

यूजीसी ने 2026 के ये नियम रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला और पायल तड़वी की मां आबेदा सलीम तड़वी की 2019 में दायर एक जनहित याचिका के बाद बनाए थे। इस याचिका में उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को दूर करने के लिए एक मजबूत तंत्र स्थापित करने की मांग की गई थी। रिपोर्टों के अनुसार, रोहित वेमुला और पायल तड़वी दोनों ने अपने विश्वविद्यालयों में कथित जाति-आधारित भेदभाव का सामना करने के बाद आत्महत्या कर ली थी।

केंद्र सरकार ने मार्च 2025 में उच्चतम न्यायालय को सूचित किया था कि यूजीसी ने जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दों के समाधान के लिए नियमों का मसौदा तैयार कर लिया है। उस समय न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि उसका इरादा परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक 'बहुत मजबूत और पुख्ता तंत्र' सुनिश्चित करना है।

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