पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में चल रहे पुस्तक मेले में इस बार एक अनोखा ग्रंथ लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया है। 07 दिसंबर, रविवार को दुनिया की सबसे महंगी किताबों में से एक मैं की प्रदर्शनी ने हर किसी को चौंका दिया। करीब 41 वर्षों से लगातार लग रहे इस पुस्तक मेले का उद्घाटन 5 दिसंबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था लेकिन इसके बाद जो सबसे ज्यादा चर्चा में रहा, वह यही रहस्यमय ग्रंथ है। दावा है कि इसकी कीमत 15 करोड़ रुपए है और इसे दुनिया की सबसे महंगी किताबों में से एक माना जा रहा है।
लेखक मौजूद, लेकिन पन्ने पलटने की मनाही
रविवार को इस ग्रंथ के लेखक रत्नेश्वर स्वयं गांधी मैदान में मौजूद थे। हालांकि पुस्तक का विधिवत अनावरण किया गया लेकिन किसी भी दर्शक को इसके पन्ने पलटने की अनुमति नहीं दी गई। केवल शोकेस के जरिए ही लोगों को इसकी झलक दिखाई गई। इससे लोगों की जिज्ञासा और भी बढ़ गई कि आखिर इस किताब में ऐसा क्या है, जिसकी कीमत करोड़ों में रखी गई है और जिसे छूने तक की मनाही है।
किताब की कीमत 15 करोड़ रुपए क्यों?
किताब की कीमत को लेकर लेखक रत्नेश्वर का अपना तर्क है। उन्होंने किताब की कीमत के बारे में कहा कि, जिस तरह से मेरा दर्शन है और मैंने ब्रह्म की पूरी यात्रा की, उसी में मुझे इसकी कीमत भी मिली कि इस ग्रंथ की कीमत 15 करोड़ रुपए रखनी चाहिए। नहीं तो हम इसका कुछ भी कीमत रख सकते थे। 50 करोड़ भी रख सकते थे, 100 करोड़ भी रख सकते थे। 15 करोड़ की कीमत मेरे नहीं, बल्कि ब्रह्म के द्वारा तय की हुई है।
मानने से जानने… की यात्रा का दावा
मैं ग्रंथ को लेकर लेखक रत्नेश्वर ने बताया कि यह पुस्तक ज्ञान की परम अवस्था का रहस्य उजागर करती है। उनके अनुसार, यह वही स्थिति है जिसे अक्सर बुद्धत्व या पूर्ण ज्ञान प्राप्ति कहा जाता है। उन्होंने दावा किया कि इस ग्रंथ में वे बातें हैं; जो रामायण, महाभारत, वेद-पुराण, उपनिषद, बाइबल या कुरान तक में नहीं मिलतीं। यह किताब मनुष्य को मानने से जानने की यात्रा पर ले जाने का प्रयास करती है, जहां व्यक्ति स्वयं अपनी आंतरिक अनुभूति से सत्य को देख सके।
पूरी दुनिया में बिक्री के लिए सिर्फ 3 किताबें
यह ग्रंथ हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुआ है। अंग्रेजी संस्करण में 408 पृष्ठ और हिंदी में 382 पृष्ठ हैं। कुल मिलाकर केवल 16 प्रतियां छापी गई हैं। आठ हिंदी और आठ अंग्रेजी में। इनमें से सिर्फ तीन किताबें ही बिक्री के लिए उपलब्ध होंगी। बाकी 13 प्रतियों में से दो को केंद्रों में स्थापित किया जाएगा, जहां लोग आकर केवल दर्शन और अध्ययन कर सकेंगे। शेष 11 किताबों के साथ 11 लोग पूरी दुनिया में जाकर इस ग्रंथ का प्रचार करेंगे, जिन्हें मैं रत्न कहा जाएगा।
3 घंटे 24 मिनट में मिला ज्ञान, 90 दिनों में लिखा ग्रंथ
किताब के लेखक रत्नेश्वर ने बताया कि इस पुस्तक को लिखने में उन्हें तीन महीने लगे, लेकिन ज्ञान केवल 3 घंटे 24 मिनट में प्राप्त हुआ था। उनके अनुसार, 7 सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के ठाणे के जंगल में रत्न मुहूर्त के दौरान उन्हें यह अनुभव हुआ। उन्होंने दावा किया कि उस समय उन्होंने अपने त्रिनेत्र से ब्रह्मांड की खरबों वर्षों की यात्रा देखी और 21 दिनों तक स्थितप्रज्ञ अवस्था में रहे। वही अनुभूतियां इस ग्रंथ का आधार बनीं।
कौन हैं लेखक रत्नेश्वर
बिहार के वारसलीगंज में 1966 में जन्मे रत्नेश्वर का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। बचपन में पिता का निधन, आर्थिक तंगी, कर्ज और पैदल खेतों में काम जैसी कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। कहानी कहने का शौक उन्हें स्कूल से था। आगे चलकर उन्होंने पत्रकारिता, शिक्षण और लेखन के क्षेत्र में पहचान बनाई। पटना यूनिवर्सिटी, बीएचयू, डीयू और आईआईएमसी जैसे संस्थानों में पढ़ाया। आज मैं ग्रंथ को लेकर वे राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय चर्चा में हैं।